शुक्रवार, मार्च 23

खबरिया चैनल का टाम एण्ड जेरी शो चालू है


छह मार्च,दो हजार बारह। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मतगणना का दिन। सुबह के आठ बजे मतगणना प्रारम्भ होनी थी। टीवी पर खबरिया चैनलों ने अपने-अपने ‘चैनल फ्रेण्डली’ विशेषज्ञों को स्टूडियो में बैठा लिया था। स्क्रीन पर हर प्रदेश के लिए रुझान दर्शाने वाले मीटर लगा दिये गये थे। चुनावी जुगालियों का दौर सुबह होते ही शुरू हो चुका था। विशेषज्ञों को बार-बार कयास लगाने के लिए पे्ररित किया जा रहा था। कुछ विशेषज्ञ तो बार-बार की चैनलिया कोशिशों को नाकाम कर दे रहे थे, लेकिन कई बच नहीं पा रहे थे और गड-मड सा कयास लगा ही दे रहे थे।
सुबह के आठ बजते ही एकाएक एंकरों की भाषा बदल गयी। एक अजीब सी होड़ में लोग शामिल हो गये। कुछ ही मिनटों में रुझान के आंकड़े तरह-तरह से बने-ठने मीटरों पर दिखने लगे। एक चैनल ने इस होड़ में शुरुआती बढ़त ले ली और वह लगातार बढ़ता ही गया। टीआरपी गणित के पण्डितों ने जैसे ही सूचना दी कि रुझान बताने की होड़ में फलां चैनल आगे निकल रहा है तो एक दूसरे बड़े चैनल के इलीट कहे जाने वाले एंकर ने बिना उस चैनल का नाम लिए जनता को अगाह करना शुरू कर दिया गया। वह एंकर न जाने क्या-क्या कहता गया और पत्रकारिता के एथिक्स की दुहाई दे-दे कर एथिक्स की ऐसी-तैसी कर डाली। वास्तव में ये एंकर महाशय लगभग गरियाते हुए कहे जा रहे थे कि कुछ चैनल गलत आंकड़े दिखा रहे हैं, उस पर विश्वास मत करिये, केवल हमारा चैनल ही सही आंकड़े दिखा रहा है, हम चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़े दिखा रहे हैं और वह फर्जी आंकड़े दिखा रहा है, वगैरह-वगैरह। दूसरी ओर वह चैनल अपनी स्क्रीन पर लगे रुझान बताने वाले मीटर में बढ़त लेता रहा और दावा करता रहा कि उसके रिपोर्टर स्थान-स्थान पर बने हुए हैं और मौके से खबर दे रहे हैं। यही वजह है कि उसके आंकड़े अन्य चैनलों के आंकड़ों से बहुत आगे हैं।  इस चैनल का एंकर विजयी होने के दंभ में लगातार आगे रहने की बात कहता रहा। ‘टाम एण्ड जेरी’ सरीखे  इस खेल का दर्शक तो आनंद ले ही रहा था, कई विशेषज्ञ भी मजा लेने से नहीं चूके। बहरहाल यह तो कहा ही जा सकता है कि खबरिया चैनलों के इतिहास में यह पहला मौका था जब सीधे प्रसारण के दौरान एक टीवी एंकर लगातार दूसरे खबरिया चैनलों पर विश्वास न करने की गुजारिश करते हुए अपनी बिरादरी के लोगों को झूठा कहने पर मजबूर होता रहा।
मतगणना के दौरान जब वह टीवी एंकर दूसरे चैनल को झूठा और मीडिया एथिक्स के खिलाफ बता रहा था तो एक बात लगातार दिमाग में आ रही थी कि क्या इलेक्ट्रानिक माडिया के लिए इस तरह की कोई एथिक्स है और अगर है तो क्या उसका पालन शिद्दत के साथ किया जाता है? अपनी-अपनी ठपली और अपना-अपना राग अलापने वाले खबरिया चैनलों के निरंकुश रवैये पर तो प्रेस कौंसिल आफ इण्डिया के वर्तमान अध्यक्ष भी गरमा-गरम बयान दे चुके हैं। खबरिया चैनलों के अपने ‘न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन’ द्वारा घोषित नीति संहिता और प्रसारण मानक भी बहुत कारगर सिद्ध होते नहीं नजर आते हैं। इस एसोसिएशन की घोषित संहिताओं में साफ कहा गया है कि ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पेशेवर पत्रकारों को यह स्वीकार करना चाहिये और समझना चाहिये कि वे जनता के विश्वास के पहरुए यानी पहरेदार हैं।’ इन्हीं संहिताओं में यह भी लिखा गया है कि ‘लोकतंत्र में खबरों के प्रसारण का बुनियादी उद्देश्य है, लोगों को शिक्षित करना और उन्हें यह बताना कि देश में क्या हो रहा है ताकि देश की जनता महत्वपूर्ण घटनाओं को भली-भांति समझ सके और उनके मुताबिक निष्कर्ष निकाल सके।’ अब जरा सोचिये कि एक टीवी एंकर का यह चिल्लाना कि ‘फलां चैनल झूठ बोल रहा है, उस पर विश्वास मत करिये’ साफ संदेश देता है कि ये खबरिया चैनल लोगों में इतनी भी समझ पैदा नहीं कर पाये हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यह भी कहा जा सकता है कि हल्ला मचाने वाले एंकर और उसकी तरह के टीवी पत्रकार अभी भी भारतीय दर्शकों को मूर्ख ही समझते हैं और यह जरूरी समझते हैं कि उन्हें बताना जरूरी है कि वे क्या देखें और क्या नहीं।

और अब बारी है...                                                    
नामवर जी जब बोलते हैं तो कुछ अलग ही बोलते हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में उन्होंने कहा कि अमरकांत को सम्मानित होते देख कर अच्छा लग रहा है। मुझे और अच्छा लगेगा जब इसी तरह शेखर जोशी को भी सम्मानित होते देखूं। और फिर बिना रुकते हुए उन्होंने कहा कि इस शहर में कई लोग हैं जिन्हें मैं सम्मानित होते देखना चाहता हूं। उनमें दूधनाथ भी शामिल हैं। बस फिर तो सबकी निगाहें शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह की ओर मुड़ गयी। उस समय दोनों ही नामवर के इस बयान पर मुस्करा रहे थे, अपनी-अपनी मुस्कराहट के अपने-अपने मायनों के साथ।