शनिवार, जनवरी 19

कुंभ में सीखिए लाइफ मैनेजमेंट का फण्डा


धनंजय चोपड़ा
दुनिया का सबसे बड़ा कहा जाने वाला मेला सज चुका है। वह मेला जहां, भारतीय संस्कृति चमक  रही है-दमक  रही है और पूरे विश्व को अपने भीतर समेट लेने की क्षमता को दिखा रही है। वह मेला, जहां धर्म आकाश के सभी सितारे गंगा-यमुना के संगम तट पर बिखरी रेत को जीवंतता देने के लिए उपस्थित हो चुके हैं। वह मेला,जहां मंत्र गूंज रहे हैं और मार्केट के फण्डे भी। वह मेला जहां धर्म सत्ता है तो राज सत्ता भी। वह मेला, जहां करोड़ों लोग जीवन की तमाम दुश्वारियों को हाशिए पर रखते हुए लाइफ मैनेजमेंट के कारगर फण्डों से हमारा सामना कराते मिल जाते हैं। सच तो यह है कि कुंभ में  सामाजिकता की ऐसी प्रोफाइल हमारे सामने है कि हम अपनी खुशियों की नई-नई परिभाषाएं गढऩे पर मजबूर हो जाएं। शायद यही वजह है कि माघ महीना शुरू होने से पहले ही अपनी-अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ उन लाखों लोगों का भी यहां पहुंचना शुरू हो चुका है, जो कुछ दिनों के लिए इस तंबुओं की कुंभ नगरी को दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाली नगरी बनाएंगे।
वास्तव में हम मेलों को महज भीड़ का जमावड़ा ही समझते हैं। हमें लगता है कि यहां पहुंचने वालों के पास समय ही समय है। हम यह सोच ही नहीं पाते हैं कि ये लोग महीने भर धर्म और आस्था की डोर पकड़े जीवन और जीवन के बाद सुखी रहने की कवायद करने ही जुटे हैं। सच तो यह है कि संगम की रेती पर लगने वाले कुंभ में सोशल और लाइफ मैनेजमेंट के कारगर फण्डों से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है। यहां आने वालों के लिए कई पण्डालों में योग का प्रशिक्षण चल रहा है तो कई में दुख और विषाद से उबरने के तरीके बताए जा रहे हैं। यहां मुरारी बापू का प्रवचन हो रहा है, तो स्वामी चिदानंद के शिविर में सोशल फण्डों से लोगों को लैस किया जा रहा है। कई शिविरों में विदेशी पर्यटकों को प्रकृति के साथ जुडक़र जीने की कला सिखायी जा रही है। कल्पवासियों को ऐसे टिप्स दिए जा रहे हैं जो अगले बारह बरस तक उन्हें जीने की कला से जोड़े रखेंगे। ये करोड़ों लोग कल्पवास यानी एक माह तक संगम के तट पर रहने के बहाने खुद को रिजुवनेट करने की कोशिश करते हैं। खुद को फिर से फिर से तरो-ताजा करने की यह कवायद टाइम मैनेजमेंट और माइंड मैपिंग के फण्डों से लैस होती है। अब देखिए न, कडक़ड़ाती ठंड में लगने वाले इस मेले में दुश्वारियों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन मजाल है कि कल्पवास करने पहुंचने वाला कोई भी आपको शिकायत करता हुआ मिल जाए।
तंबुओं की इस नगरी का विहंगम दृश्य करोड़ों लोगों की आंखों में बस सा जाता है और शायद यही वजह है कि वे बारह वर्ष इसके फिर से बसने का इंतजार करते हैं और फिर बिना किसी निमंत्रण के यहां पहुंच जाते हैं। दुनिया के इस सबसे बड़े मेले की खास बातों में हमारी संस्कृति के वैविध्य का सहजता से उपस्थित होना भी शामिल है। एक सच यह भी कि कुंभ मेले के दौरान संगम की रेत का हर एक कण अनगिनत रचनाओं से हमारा सामना कराता है।  पग-पग पर मिलती रचनाएं देश-दुनिया के आर्टिस्टोंं को इस हद तक अट्रैक्ट करती हैं कि एक कुंभ इन आर्टिस्टों का भी यहां अनायास ही उपस्थित हो जाता है। फोक कल्चर का इतना बड़ा जमावड़ा दुनिया भर में और कहीं नहीं मिलता। यही वजह है कि यहां  दुनिया भर के रचनाकार, कलाकार और मीडियाकर्मी कुछ नया सहेजने की तलाश में जुटते हैं। यहां अनगिनत कहानियां रची जा रही हैं तो न जाने कितनी डाक्युमेंट्रीज बन रही हैं। कई रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है  तो कई सर्वे भी। कुंभ इतिहास का यह पहला मौका है जब लाखों मोबाइल फोन कैमरे यहां के सुखद क्षणों की यादों के साथ-साथ वह सबकुछ सहेज ले रहे हैं, जो स्मृतियों में सहेजे जाने के लिए जरूरी होगा। आईटी के इस समय में कुंभ को इस बार सोशल मीडिया का साथ भी पहली बार मिल रहा है। तय है कि इंटरनेट पर तैरती फोटो और पोस्ट बहुत कुछ नया आभास देंगी।  
वास्तव में यहां कैनवास पर उकेरे जाते चित्र, कलमबद्ध होते यहां के आख्यान और कैमरों में कैद होते दृश्य इसकी सामाजिक व सांस्कृतिक परम्पराओं का दस्तावेज भर नहीं होते, बल्कि हमारे अपने समय का वह बड़ा सच होते हैं, जिसके सहारे हम आगे के रास्तों को मंजिल तक पहुंचाने का काम करते हैं। कुंभ मेला सिर्फ मेला भर नहीं होता वह हम सब को हर बारह बरस बाद जीवन के कुछ जरूरी अध्याय दोहरवाने के लिए आता है।

बुधवार, जनवरी 2

...अपने ढंग से जिएं जिन्दगी


हाल ही में मेरी मुलाकात कुछ ऐसे प‎‎‎ोफेशनल से हुई, जिन्होंने पन्दह से पच्चीस साल कार्पोरेट दुनिया में बिताने के बाद एकाएक नौकरी छोड़ दी और वह काम करने लगे,जिसकी ललक उनके दिल-दिमाग में नौकरी शुरू करने से पहले हुआ करती थी। इन दिनों कोई कैनवास पर अपनी मनोभावों को उकेरने और उनमें रंग भरने में लगा हुआ है तो कोई शबदों की खिलंदड़ी में शामिल होकर किताब लिख रहा है। किसी ने अपने गांव लौटकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोल लिया है तो कोई ज्वेलरी डजाइनिंग करने में मस्त है। कुछ ऐसे भी हैं, जिनदगी जीने के ढंग सिखाने का बीड़ा उठा रखा है और अब घूम-घूम कर वे लोगों को इस भागती-दौड़ती रफतार वाली दुनिया में जीते हुए अपने और अपनों के लिए समय निकालने की कला सिखा रहे हैं।
बातचीत के दौरान इन सबकी जुबान पर एक ही बात आत आती है कि दूसरों के ढंग से जीने की कवायद ने उनसे वह सब कुछ छीन रखा था, जो उनके दिल-दिमाग में रचा-बसा था। नौकरी करते हुए वह अपने ढंग का कुछ कर ही नहीं पाते थे और न ही इतनी फुरसत थी। भले ही अब उतन कमाई नहीं है, लेकिन पिछले टेन्योर से कहीं अधिक संतुष्ट हैं। सबसे बड़ी बात कि अब अपने ढंग-अपने अंदाज में जिन्दगी जी रहे हैं। इन सबका मानना है कि करियर के लिए अपना रंग-ढंग छोडक़र वे कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाये थे। बार-बार ऐसा लगता था कि हीं कुछ छूटा सा जा रहा है। यही वजह थी कि जिन्दगी जीने की रफ्तार को कुछ धीमा करके अपना रंग-ढंग वापस पाने में लग गये हैं। इन सबने माना कि पैसा कमाने की होड़ में शामिल रहते हुए इनसे केवल इनकी ललक ही नहीं छिनी हुई थी, बल्कि इनके अपने भी इनसे कहीं दूर से हो चले थे।
वास्तव में जब हम अपनी पोफेशनल लाइफ और पर्सनल लाइफ के बीच सही संतुलन नहीं बैठा पाते तो हमसे बहुत कुछ छूट सा जाता है और छूटे हुए का बड़ा हिस्सा पर्सनल ही रहता है। हम अपने पर्सनल को यह सोचकर करियर पर कुर्बान करते रहते हैं कि पहले पैसा कमा लिया जाये तब फिर अपने बारे में सोचेंगे। करियर और परिवार को बेहतर देने की होड़ और हड़बड़ी में हम अपने भीतर दबी ललक को भी नजरअंदाज किये रहते हैं। मेरी मुलाकात जिन लोगों से हुई थी उन्होंने पन्दह से बीस साल पैसा कमाने के बाद नौकरी छोड़ी थी। उन्होंने जब अपने दिल-दिमाग के हिसाब से चलने क ी ठानी तब उनकी जेब इतनी तो भरी थी कि उनको किसी तरह का अभाव नहीं था। ये लोग ‘देर से आये, दुरुस्त आये’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे थे।
सच तो यह है कि हम अपनी छोटी सी जिन्दगी का मकसद ही तय नहींं कर पाते। हम जिन्दगी के एक फेज को पूरा करते ही अनायास करियर पाने, उसे बनाने और फिर उसे बचाने की होड़ में शामिल हो जाते हैं। जिन्दगी जीने के लिए है न कि बिताने के लिए। धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाला ‘बस बीत रही है’ का जुमला हताशा ही जताता है। इससे खुद को बचाना होगा। और,  अगर जिन्दगी जीना है तो यह तय होना चाहिये कि हम अपने पोफेशनल और पर्सनल व करियर और किएटिविटी के बीच किस तरह संतुलन बना कर चलेंगे। आधी जन्दगी पैसा कमाने में खपाने के बाद अपने ढंग से जीने की कवायद शुरू करने से पहले ही यह तय हो जाना चाहिये कि हम अपने समय और समाज में अपनी उपस्थिति  किस तरह दर्ज करायेंगे।

रविवार, दिसंबर 30

आज सडक़ों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख



साल के अंतिम दिन कवि दुष्यंत की ये पंक्तियां दोहरा लेने का मन कर रहा है- आज सडक़ों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, घर अंधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख। एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाजुओं को देख, पतवारें न देख। राख, कितनी राख है चारों तरफ बिखरी हुई, राख में चिनगारियां ही देख, अंगारे न देख।
बहुत कठिन समय बिताते हुए हम सब नए साल में प्रवेश कर रहे हैं। सन दो हजार बारह कई मायनों में संघर्षों का साल रहा। हमने कई-कई लड़ाइयां लड़ीं और हार-जीत के समीकरण से जूझते रहे। हमारी खुशियों ने हमारा साथ छोड़ा, पर हम खुश थे कि हम चुप नहीं हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। हमारे हिस्से के सुख और अधिकार सत्तासीनों ने हड़प लिए,पर हम खुश थे कि हम चुप नहीं हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। हमारे अपने समाज की अस्मत खतरे में आती रही, पर हम खुश थे कि हम चुप नहीं हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। सत्ता को ललकारने और सत्ता पाने के खेल में हमारा इस्तेमाल होता रहा,पर हम खुश थे कि हम चुप नहीं हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। .... आवाज बुलंदी के इस खेल में कब हमारी आवाज नक्कार खाने की तूती समझ ली गई, हम समझ ही न पाए। हम आवाज बुलंद करते रह गए और खेल खत्म करके दूसरे खेल के शुरू होने की घोषणा कर दी गई और हम ठगे से मुट्ठियों को हवा में लहराते रह गए। हमारे खुद के होने को बेमानी कर दिया गया और मोमबत्तियां जलाकर आंसू बहाने वालों के साथ खड़े हम रोते हुए दिखने लगे। हम यानी साधारण जीवन जीने वाले लोग महज इसी लिए बने हैं क्या? यह सवाल इस साल भी बिना उत्तर पाये ही रह गया।
वास्तव में पीछे मुडक़र देखने पर देश-दुनिया की एक ही तस्वीर उभरकर सामने आती है। सडक़ों पर भीड़ है और जुबान पर सत्ता को धिक्कारते नारे। पुलिस की लाठियां हैं और फूटते आंसू गैस के गोले। सत्ता की बयानबाजी है और सत्ता पाने के लोभ में बिखरते लोग। आवाज उठाते लोग और हाशिये पर जाते अलम्बरदार। हर बार टूट कर बिखरते और फिर खड़े होकर मुठ्ठियां तानते लोग। ऐसे में अगर कुछ शेष है तो बस विडम्बनाओं भरे समय से गुजर कर पकते और पुख्ता होते हम यानी हमसे बनने वाला जनमानस ही तो है जो कुछ आशा बंधाता दिख रहा है। तो आइये हम सब इसी जनमानस का हिस्सा बनकर नए साल सन दो हजार तेरह में प्रवेश कर जाएं। हम रोशनी हैं उन पीढिय़ों के लिए, जो हमारे पीछे बहुत विश्वास के साथ बढ़ती चली आ रही हैं। हम हारे तो तय है कि फिर कई पीढिय़ों के खाते में हम दुश्वारियों का पुलिंदा ही दे जाएंगे। तो अपनी आशाएं बरकरार रखने की आदत को ताजा कीजिए और निकल पडि़ए नई यात्रा पर। नया साल देहरी पर मुस्कराकर नई खुशियों को सहेजने और नई मंजिलें तय करने का आमंत्रण दे रहा है। शुभकामनाएं।  

शनिवार, मार्च 24

बैठे-ठाले: वे हमारे फुटकर सुख

बैठे-ठाले: वे हमारे फुटकर सुख

वे हमारे फुटकर सुख




धनंजय चोपड़ा

हम हमेशा ऐसे सुखों के इंतजार में रहते हैं, जिन्हें सेलिब्रेट कर सकें और जब तक ऐसे बड़े-बड़े सुख हमारे अपने खाते में नहीं आते तब तक हम खुद को दुखी लोगों की भीड़ का हिस्सा मानकर दयनीय बने रहते हैं। कभी-कभी दूसरों की सुहानुभूति का पात्र बनकर हम सोचते हैं कि ईश्वर हमपर दया करेगा और हमारे हिस्से का ‘बड़ा सुख’ हमारी झोली में डाल ही देगा। इस सारी कवायद में हम अपने हिस्से के ‘फुटकर सुखों’ को नकारते रहते हैं। शायद अनजाने में या यूं कहें कि लापरवाही में। फुटकर सुख यानी ऐसे सुख, जो छोटे-छोटे होते हैं और छोटी-छोटी खुशियां बांटते हमें अकसर मिल जाया करते हैं।
सच कहूं तो पहली बार फुटकर सुख का अहसास मेरे मित्रों ने कराया। वह मेरा छात्र जीवन था। हम सब एक परीक्षा देने जालंधर में थे। दिनभर की आपाधापी और परीक्षा का तनाव झेल लेने के बाद हम जालंधर की सडक़ों पर तफरी कर रहे थे। हमें बताया गया था कि ‘सूर्य अस्त, जालंधर मस्त’। बस इसी मस्ती का अहसास करने सभी निकले थे। मैं शायद कुछ ज्यादा ही तनाव में था सो उस जिन्दादिल शहर की मस्ती में गाती-चिल्लाती अपनी मित्र मंडली में साथ रहते हुए भी अलग-थलग था। होटल लौटकर सभी संतुष्ट थे कि आज का दिन सुख से बीत गया, सिवाय मेरे। सबको हंसता और यादगार लमहों बात करते देख अनायास मुझे लगा कि मैंने उस सुख से वंचित रहकर ठीक नहीं किया। खैर गलती सुधारने के लिए मुझे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। दूसरे दिन भी घूमने-फिरने का प्रोग्राम था और इस बार मैंने फुटकर में मिले इस सुख का पूरा मजा लिया।
बाद में मेरी आदत सी बन गयी फुटकर सुख बटोर लेने की। कभी ट्रेन के सामान्य डिब्बे में बम्पर भीड़ के साथ सफर करने का सुख उठाया तो कभी बिजली या फोन का बिल जमा करने की लम्बी-लम्बी लाइन में घंटों खड़े रहने का। कभी रात के अंधेरे में सुनसान सडक़ पर जोर-जोर चिल्लाने का तो कभी किसी बड़े की डाट सुनकर चुप रह जाने का। कभी बरसात के दिनों में जान-बूझकर रेनकोट आफिस में भूलकर जमकर भीग जाने का तो कभी सडक़ में भरे बरसाती पानी में किसी के छपाक से गिर जाने का और फिर दौडक़र उसे उठाने का। कभी किसी बच्चे को हंसा देने की कोशिश करने का तो कभी किसी सुन्दर चेहरे को मुस्कुराकर देखने के बाद उसकी ‘स्माइल’ का इंतजार करने का। कभी स्कूटर छोड़ रिक्शे पर बैठकर आराम से चारों तरफ देखते हुए लोगों की नमस्ते और मुस्कुराहटों का जवाब देने का तो कभी सिटी बस में घंटों सफर करने का। कभी किसी बुजुर्ग का हाथ पकडक़र रास्ता पार करा देने का तो कभी बस छूट जाने से परेशान बच्चे को स्कूल पहुंचा देने का । कभी सडक़ किनारे भुट्टा खाने का तो कभी ठेले से मुफ्त की मूंगफली उठाकर खा लेने का सुख। .. ..ठेर सारे ऐसे ही और भी सुख हैं, जो फुटकर सुख की श्रेणी में आते हैं और जिनका अहसास करना हमारे लिए बहुत जरूरी होता है।
मीडिया में काम करते हुए कई बार मुझे इन्ही फुटकर सुखों से खबरें भी मिलीं और उन्हें मेरे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। मुझे याद है कि एक बार मैंने ट्रेन के जर्नल डिब्बे में सफर करने की लाइव कमेंट्री लिखी थी और पाठकों के ढेर सारे खत यह कहते हुए दफ्तर पहुंचे थे कि जो कुछ हम भोगते हैं उसे पढक़र मजा आया और इसी बहाने अपनी सोच को बदलने का मौका भी मिल गया। सच कहूं तो उन्हीं दिनों मुझे इन फुटकर सुखों की ताकत का भी अहसास हुआ। हम ट्रेन के डिब्बे में भीड़ या फिर किसी काउंटर पर लगी लम्बी लाइन को देखकर, अनायास होने वाली बारिश या फिर सडक़ पर हुए जलजमाव को देखकर या फिर ऐसी ही किसी बात पर घबड़ा जाते हैं या फिर भडक़ जाते हैं। लेकिन उनमें छिपे फुटकर सुखों को खोज निकालें और उनका लुत्फ उठायें तो बात ही कुछ और हो जाती है। सुख और दुख दोनों ही हमारे साथ-साथ अपनी-अपनी जिन्दगी पूरी करते हैं। यह तो हमारे ऊपर होता है कि हम अपने बेहतर समय के सुखों के साथ-साथ दुख देने वाले लमहों में फुटकर सुखों को खोज लें और भरपूर जिन्दगी जियें। .. .. जिन्दगी मिलेगी न दोबारा।
                 






शुक्रवार, मार्च 23

अपने समय का एक बड़ा सच हैं अमरकांत


 अपने समय को समझना और फिर उसे रचनाओं में उकेर देना का काम करने वाले शब्द शिल्पी अमरकांत को कल ज्ञानपीठ से सम्मानित किया जाना  साहित्य जगत के लिए ही नहीं बल्कि हिन्दी जगत के लिए बड़ा अवसर है। अमरकांत उन गिने-चुने रचनाकारों में से हैं जो अपने समय को बखूबी जीते हैं, उसमें रम जाते हैं, उसकी मिठास, उसकी कड़ुवाहट, उठा-पटक और उससे मुठभेड़ का अनुभव लेते हैं और फिर डिप्टी कलक्टरी, जिंदगी और जोंक, बस्ती, हत्यारे, सुन्नर पाण्डे की पतोहू, आंधी और इन्हीं हथियारों जैसी कालजई कृतियां रच डालते हैं। वे अपने जीवन के तमाम तरह के संघर्षों से जुझते हुए तो मिलते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं मिलती। वे हर हाल में जोश के साथ मिलते हैं और हर किसी में आत्मविश्वास और उत्साह भर देते हैं।
प्रेमचन्द के बाद अगर किसी कहानीकार पर निगाह ठहराने का मन करता है तो वह अमरकांत ही हैं। आजादी की लड़ाई के दिनों से ही बेबाकपन अपनाकर अपनी जिंदगी की राहों को तय करके निकल पडऩे वाले अमरकांत भोगे हुए सच पर कलम चलाते गये और हिन्दी पट्टी की चेतना के प्रतीक बन गये। यही वजह है कि उनकी कहानियां अद्भुद कलात्मकता के कारण कई-कई पीढिय़ों की आवाज बनकर समाज के साथ-साथ बनी हुई हैं। ‘बस्ती’ कहानी अगर देश के भविष्य पर बेबाक टिप्पणी करती है तो ‘हत्यारे’ अपने समय के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने और पीढिय़ों में आई हताशा से साक्षात्कार कराती है। ‘डिप्टी कलक्टरी’ अपने समय के सच को बखान तो करती है, लेकिन उसके बाद बी हर समय का प्रतिनिधित्व करती मिलती है। गगनबिहारी और छिपकली, बौरइया कोदों जैसी कहानियां भी इसी कसौटी पर खरी उतरती हैं।
अमरकांत को पढ़ते हुए इस बात का अहसास सहजता से हो जाता है कि वे आशा और निराशा के बीच घड़ी के पेण्डुलम की तरह झूलते भारतीय समाज को बखूबी समझते हैं और शायद यही वजह है कि वे व्यंग्य की मार से सबकुछ दुरुस्त कर लेने की कोशिश नहीं छोड़ते। भले ही अमरकांत सामाजिक उठापटक से खुद को तटस्थ रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी रचनाएं ऐसा नहीं कर पातीं और सामाजिक विडम्बनाओं और विद्रूपताओं के खिलाफ चीख-चीख कर अलख जगाने में जुटी रहती हैं। पेश से पत्रकार होना उनके लिए जरूरी सा लगता है। ज्यादातर रचनाएं यह सिद्ध भी कर देती हैं कि वे मूलत: पत्रकार ही हैं। वास्तव में अमरकांत जिस अंदाज में बात कहते हैं, वह एक अलग तरह का आभास देता है। इस अंदाज को अमरकांत शैली कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वे अपने पास बैठे हर किसी को यह अहसास ही नहीं होने देते के वह अपने समय के किसी बड़े रचनाकार के पास बैठा है। वैसे भी अमरकांत को अपने पीछे की कई-कई पीढिय़ों को तैयार करने का श्रेय दिया जाये तो गलत नहीं होगा। वे इतने आत्मीय और सहज हैं कि हर छोटा-बड़ा रचनाकार उनसे बहुत कुछ पा लेने में सफल हो ही जाता है। अब तक साहित्य अकदमी सहित कई बड़े सम्मानों को प्राप्त कर चुके अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार लेते देखना अपने समय की हर पीढ़ी के लिए बड़ी साहित्यक उपलब्धि होगी।


और जब उन्हें ‘सेवक’ उपाधि मिली 
बात १९८८ की है। सामाजिक-साहित्यिक संस्था ‘समाज सेवा सदन’ अपनी दसवीं वर्षगांठ मना रही थी। संस्था में सभी पदाधिकारी युवा ही थे। मैं भी उसमें शामिल था। तय हुआ कि अपने अपने क्षेत्र में विशेष योगदान देने वालों को ‘सेवक’ उपाधि से सम्मानित किया जायेगा। साहित्य के लिए अमरकांत का नाम तय हुआ। डर यह था कि वे इसे स्वीकार करेंगे या नहीं। अमरकांत जी उन दिनों बीमार चल रहे थे। हम सब उनके घर पहुंचे और उनसे सम्मान लेने का आग्रह किया। वे सहज ही तैयार हो गये और हमें बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहित भी किया। उन्हें सेवक उपाधि का सम्मान पत्र देते समय ऐसा लग रहा था कि हम सब सम्मानित हो रहे हैं। ...और यही सच भी था।

फेस बुक पर अमरकांत
फेसबुक पर जैसे ही पोस्ट लिखा कि अपने समय के बड़े रचनाकार अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का दिन आ गया है, वैसे ही ढेर सारे लोगों ने कुछ ही पलों में उसे लाइक करने और कमेंट लिखने की होड़ मचा दी। अनायास ही हमारे सामने वह सच था, जिस हम हमेशा यह कहकर नकारते आ रहे थे कि देश के युवाओं में अपनी भाषा के साहित्य और साहित्यकारों के प्रति लगाव ही नहीं रहा है। वास्तव में इंटरनेट पर फेसबुकिंग करते युवाओं से इस तरह की उम्मीद ही नहीं की जाती कि वे साहित्य के प्रति लगाव भी रखते हैं, जबकि सच्चाई यह है ्क लगभग सभी युवा रचनारा इन दिनों सोशल नेटवर्किंग के सहार देश-दुनिया के लोगों से जुड़े हुए हैं।




खबरिया चैनल का टाम एण्ड जेरी शो चालू है


छह मार्च,दो हजार बारह। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मतगणना का दिन। सुबह के आठ बजे मतगणना प्रारम्भ होनी थी। टीवी पर खबरिया चैनलों ने अपने-अपने ‘चैनल फ्रेण्डली’ विशेषज्ञों को स्टूडियो में बैठा लिया था। स्क्रीन पर हर प्रदेश के लिए रुझान दर्शाने वाले मीटर लगा दिये गये थे। चुनावी जुगालियों का दौर सुबह होते ही शुरू हो चुका था। विशेषज्ञों को बार-बार कयास लगाने के लिए पे्ररित किया जा रहा था। कुछ विशेषज्ञ तो बार-बार की चैनलिया कोशिशों को नाकाम कर दे रहे थे, लेकिन कई बच नहीं पा रहे थे और गड-मड सा कयास लगा ही दे रहे थे।
सुबह के आठ बजते ही एकाएक एंकरों की भाषा बदल गयी। एक अजीब सी होड़ में लोग शामिल हो गये। कुछ ही मिनटों में रुझान के आंकड़े तरह-तरह से बने-ठने मीटरों पर दिखने लगे। एक चैनल ने इस होड़ में शुरुआती बढ़त ले ली और वह लगातार बढ़ता ही गया। टीआरपी गणित के पण्डितों ने जैसे ही सूचना दी कि रुझान बताने की होड़ में फलां चैनल आगे निकल रहा है तो एक दूसरे बड़े चैनल के इलीट कहे जाने वाले एंकर ने बिना उस चैनल का नाम लिए जनता को अगाह करना शुरू कर दिया गया। वह एंकर न जाने क्या-क्या कहता गया और पत्रकारिता के एथिक्स की दुहाई दे-दे कर एथिक्स की ऐसी-तैसी कर डाली। वास्तव में ये एंकर महाशय लगभग गरियाते हुए कहे जा रहे थे कि कुछ चैनल गलत आंकड़े दिखा रहे हैं, उस पर विश्वास मत करिये, केवल हमारा चैनल ही सही आंकड़े दिखा रहा है, हम चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़े दिखा रहे हैं और वह फर्जी आंकड़े दिखा रहा है, वगैरह-वगैरह। दूसरी ओर वह चैनल अपनी स्क्रीन पर लगे रुझान बताने वाले मीटर में बढ़त लेता रहा और दावा करता रहा कि उसके रिपोर्टर स्थान-स्थान पर बने हुए हैं और मौके से खबर दे रहे हैं। यही वजह है कि उसके आंकड़े अन्य चैनलों के आंकड़ों से बहुत आगे हैं।  इस चैनल का एंकर विजयी होने के दंभ में लगातार आगे रहने की बात कहता रहा। ‘टाम एण्ड जेरी’ सरीखे  इस खेल का दर्शक तो आनंद ले ही रहा था, कई विशेषज्ञ भी मजा लेने से नहीं चूके। बहरहाल यह तो कहा ही जा सकता है कि खबरिया चैनलों के इतिहास में यह पहला मौका था जब सीधे प्रसारण के दौरान एक टीवी एंकर लगातार दूसरे खबरिया चैनलों पर विश्वास न करने की गुजारिश करते हुए अपनी बिरादरी के लोगों को झूठा कहने पर मजबूर होता रहा।
मतगणना के दौरान जब वह टीवी एंकर दूसरे चैनल को झूठा और मीडिया एथिक्स के खिलाफ बता रहा था तो एक बात लगातार दिमाग में आ रही थी कि क्या इलेक्ट्रानिक माडिया के लिए इस तरह की कोई एथिक्स है और अगर है तो क्या उसका पालन शिद्दत के साथ किया जाता है? अपनी-अपनी ठपली और अपना-अपना राग अलापने वाले खबरिया चैनलों के निरंकुश रवैये पर तो प्रेस कौंसिल आफ इण्डिया के वर्तमान अध्यक्ष भी गरमा-गरम बयान दे चुके हैं। खबरिया चैनलों के अपने ‘न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन’ द्वारा घोषित नीति संहिता और प्रसारण मानक भी बहुत कारगर सिद्ध होते नहीं नजर आते हैं। इस एसोसिएशन की घोषित संहिताओं में साफ कहा गया है कि ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पेशेवर पत्रकारों को यह स्वीकार करना चाहिये और समझना चाहिये कि वे जनता के विश्वास के पहरुए यानी पहरेदार हैं।’ इन्हीं संहिताओं में यह भी लिखा गया है कि ‘लोकतंत्र में खबरों के प्रसारण का बुनियादी उद्देश्य है, लोगों को शिक्षित करना और उन्हें यह बताना कि देश में क्या हो रहा है ताकि देश की जनता महत्वपूर्ण घटनाओं को भली-भांति समझ सके और उनके मुताबिक निष्कर्ष निकाल सके।’ अब जरा सोचिये कि एक टीवी एंकर का यह चिल्लाना कि ‘फलां चैनल झूठ बोल रहा है, उस पर विश्वास मत करिये’ साफ संदेश देता है कि ये खबरिया चैनल लोगों में इतनी भी समझ पैदा नहीं कर पाये हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यह भी कहा जा सकता है कि हल्ला मचाने वाले एंकर और उसकी तरह के टीवी पत्रकार अभी भी भारतीय दर्शकों को मूर्ख ही समझते हैं और यह जरूरी समझते हैं कि उन्हें बताना जरूरी है कि वे क्या देखें और क्या नहीं।

और अब बारी है...                                                    
नामवर जी जब बोलते हैं तो कुछ अलग ही बोलते हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में उन्होंने कहा कि अमरकांत को सम्मानित होते देख कर अच्छा लग रहा है। मुझे और अच्छा लगेगा जब इसी तरह शेखर जोशी को भी सम्मानित होते देखूं। और फिर बिना रुकते हुए उन्होंने कहा कि इस शहर में कई लोग हैं जिन्हें मैं सम्मानित होते देखना चाहता हूं। उनमें दूधनाथ भी शामिल हैं। बस फिर तो सबकी निगाहें शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह की ओर मुड़ गयी। उस समय दोनों ही नामवर के इस बयान पर मुस्करा रहे थे, अपनी-अपनी मुस्कराहट के अपने-अपने मायनों के साथ।