मंगलवार, जुलाई 22

मतवाला, खिचरी और महामना की ससुराल

पिछले दिनों अपनी लोक यात्रा के दौरान मैं मिर्जापुर में था। बहुत दिनों बाद मैं एक ऐसे शहर में था, जिसके पास विरासत में सहेजने को बहुत कुछ है, लेकिन वर्तमान में सिवाय जूझने के कुछ भी पास में नहीं। सच कहूं तो एक शहर के फक्कड़ पन के कई रूप हमारे सामने थे। अब देखिए न, सड़कें थीं, पर लगता रहा कि अगर ये न होतीं तो शायद अधिक बेहतर होता। किसी भी तरह से उन्हें पार करने की कोशिश काजिए, आपकी आंतें हिल जाने की गारंटी है। लोग हैं कि अपनी मस्ती में जिए जा रहे हैं। किसी को इन सड़कों से कोई शिकायत ही नहीं। फक्कड़ी का एक अंदाज सुबह-सुबह घाट किनारे भी दिखा। यहां जुटने वालों की दुनिया सबसे न्यारी लगी। लोगों का नदी और उसके तटबंधों से जुडऩे का मतवालापन देखते ही बना। नदी किनारे साढिय़ों पर बना-बसा 'लेडीज मार्केटÓ बार-बार अल्मोड़ा की मार्केट की याद दिलाता रहा। वह भी सीढिय़ों पर बना-बसा है। फर्क बस इतना है कि वहां की साढिय़ां पहाड़ के शीर्ष तक ले जाती हैं और यहां की साढिय़ां नदी के किनारे तक। मंदिरों के कपाट हमारी कलाओं की विरासत के अद्भुद नमूने दिखा रहे थे। कुछ लोग दीन-दुनिया से परे बंदरों के झुंड  को आम खिलाने में मस्त थे। यह सब हमारे सामने किसी पहले से तैयार स्क्रिप्ट की तरह था।
बहरहाल हम अपनी लोक यात्रा यानी लोक कलाओं को सहेजने की जुगत में यहां पहुंचे थे। 'कजरीÓ लोकगीत से जुडऩे, सहेजने और उसे डिजिटाइज्ड करने के दौरान मिर्जापुर की सांस्कृति व साहित्यिक विरासत से भी साक्षात्कार होता जा रहा था। मैं और मेरे सहयोगी अमित कजरी लोग गायकों की खोज में निकल पड़े। कजरी गायन की पर्याय मैना देवी के घर पर उनके  देवर हरिलाल से मुलाकात हुई तो हम इन दिनों की प्रख्यात गायिकाओं उर्मिला श्रीवास्तव और अजीता श्रीवास्तव से भी मिले। दिन भर के बाद हमारी मुलाकात प्रख्यात लेखक स्व. भवदेव पाण्डेय के पत्रकार पुत्र सलिल पाण्डेय से हुई और वे स्वेक्षा से हमारे संग हो लिए। उनका संग होना था कि हमारे सामने मिर्जापुर की विरासत के कई महत्वपूर्ण पृष्ठ अनायास ही खुल गए। हमारी इस लोक यात्रा के बीच ही 'मतवालाÓ प्रेस की पुरानी बिल्डिंग भी आ गई। हम वहां भी पहुंचे जहां निराला, उग्र और महादेव प्रसाद सेठ की बैठकें होतीं थीं और मतवाला की रूपरेखा तय होती थी। महादेव प्रसाद के प्रपौत्र ने हमें बताया कि प्रेस वाला हिस्सा उन्होंने बेच दिया है। उग्र जी जिस कमरे में रहते थे, वह कमरा अभी जस का तस है। अद्भुद अनुभूति थी उस स्थान पर पहुंच कर।
थोड़ा आगे बढऩे पर तिरमुहानी चौराहे पर हमें 'खिचरी समाचार प्रेसÓ दिखी। छोटी सी परचून की दुकान के ऊपर दीवार पर ही उभर हुए अक्षरों में लिखा हुआ  'खिचरी समाचार प्रेसÓ अपने आप में बहुत ही गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। यहीं से 1888 में महादेव प्रसाद घवन ने 'खिचरीÓ अखबार निकाला था। रोचक यह कि यह अखबार हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी, तीनों भाषाओं में होता था। आज घवन साहब की पुश्तों के पास परचून की दुकान के साथ-साथ उनकी यादें हैं, जिसे वे हमेशा सहेज लेने को आतुर रहते हैं। मेरे कहने पर उन्होंने खिचरी की कुछ प्रतियां दिखाईं और आग्रह किया कि कुछ ऐसे हो कि इन्हें लोग पढ़ें और महादेव प्रसाद घवन के योगदान को याद रखें। यूं तो मिर्जापुर की विरासत के कई पृष्ठ हमने खेंगाले, लेकिन एक और जिक्र अवश्य करूंगा। वह है महामना मदन मोहन मालवीय की ससुराल का। धुंधी का कटरा इलाके में एक छोटे से मकान के बाहर शिलापट्ट लगा हुआ है कि यह महामना की ससुराल है। पीतल के बर्तन बनाने वालों के इस इलाके में देश की शिक्षा, पत्रकारिता और राजनीति दिशा तैयार करने वाले महापुरुश की ससुराल होना वहां के लोगों को गर्व का अहसास कराता है। हमने जिससे भी उस गली का पता पूछा, उसने बहुत ही आत्मीयता के साथ उस ओर जाने का रास्ता बताया।
बहरहाल कुछ बनारस सी तासीर रखने वाले  इस शहर के लोगों  के लोग अपनी संस्कृति और सामाजिकता की बात करते हुए अपनी परेशानियां भूले रहने की कोशिश करते हैं। हां यह जरूर कहते हैं कि 'फूलन देवी से लेकर अनामिका पटेल तक जितने भी सांसद यहां से हुए किसी ने कुछ नहीं किया। हमने अब मांगना ही छोड़ दिया। अब कोई कुछ पहल करे तो अच्छा और न करे तो भी अच्छा।Ó शहर में प्रदेश के एक मंत्री के जनसम्पर्क कार्यालय का बहुत विशाल सा बोर्ड न जाने क्यों बार-बार आंखों के आगे आ जाता है, जिसमें लिखा है- अपनी परेशानियां हमें अवश्य बताएं। अब जिन्हें शहर के हालात दिखते नहीं, उन्हें बताए कौन।


सोमवार, जुलाई 7

कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो


एक बार फिर शहर में एक कहानी को लेकर बवाल मचा हुआ है। कहानी उर्दू में है सो अभी यह बवाल छन-छन कर गति पकड़ रहा है। वैसे कहानीकार ने जल्दी ही इसे किसी हिन्दी पत्रिका में छपवाने की घोषणा करके शुद्ध इलाहाबादी में यह जता दिया है कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó बताया जा रहा है कि कहानी अपने संगठनिया मित्रों के इर्द-गिर्द ही घूमती है, सो सारे किरदार बखूबी पहचान में आ जा रहे हैं। चूंकि किरदार जाने-पहचाने हैं, सो सभी उनकी करस्तानियों से भी वाकिफ हैं, लिहाजा किरदारों को अपने आस-पास के लोगों में फिट कर देने की जुगत भिड़ाने की होड़ लगी है। संगठन में उबाल है। कहानीकार है कि किसी को सेठने से इंकार करके यह दलील देने में लगा है कि चूंकि कहानी ज्वलंत मुद्दे पर है सो उसे हम अपने आस-पास ही पाएंगे। और जब कहानी आस-पास ही होगी तो किरदार भी तो हमारे बीच के ही होंगे।
बहरहाल अपने ही लोगों पर कहानी लिखकर तहलका मचाने का यह खेल नया नहीं है। पहले भी इस शहर ने कहानियों पर मचते बवाल को देखा-सुना है। कई बवाल तो राष्ट्रीय स्तर पर 'ख्यातिÓ बटोरने में भी कामयाब हुए थे। मुझे याद हैं वे दिन जब शहर में तथाकथित कहानियों के फोटोस्टेट बंटा करते थे और लोगों को जबरन पढ़वाया जाता था। इस खेल में पक्ष-विपक्ष दोनों ही शामिल रहा करते थे। साहित्यिक संगठन उस समय इसी तरह चुप थे, जिस तरह आज हैं। अंदर ही अंदर निपटने की कवायद चलती रही। पता नहीं किस तरह निपट रहे थे लोग। उन 'सत्य कथाओंÓ की व्यथा इतनी गंभीर थीं कि आज तक तथाकथित किरदारों में टीस के रूप में समायी हुई हैं। जो अब रहे नहीं उनके प्रति संवेदना अभी लोगों के दिल में है।
कभी साहित्यिक आंदोलनों के अगुआकार रहने वाले इस शहर में कहानियों और लेखों के जरिए  'कीचड़ उछालो और मस्त रहोÓ के जुमले को चरितार्थ करने के  भी प्रयास हुए हैं। एक कहानी में तो पूरा का पूरा एक साहित्यिक खेमा ही समाया हुआ था। कहते हैं कि उस कहानी को कुछ विरोधी खेमे के लोगों ने स्वयं बैठकर तैयार करवाया था। यह कहानी भी शहर भर में फोटोस्टेट कराकर बंाटी गई थी। करते भी तो क्या करते। कहानी छपी ही थी किसी गुमनाम सी पत्रिका में। कुछ और भी उदाहरण हैं ऐसी ही 'कथा करतूतोंÓ की, जिनका जिक्र करना कुछ ज्यादा ही हो जाएगा।
कहते हैं कि इतिहास अपने आपको दोहराता जरूर है। हो भी यही रहा है। शहर में एक बार फिर कहानी पर बवाल मचा है। लगातार इसे प्रचार देने की कोशिशें भी हो रही हैं। पहले इस्तीफे की राजनीति से इस मुद्दे को गरमाने का प्रयास हुआ और अब संगठनिया कार्रवाई की मांग करके इसे रोशनी में लाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। कहानीकार भी इसे हिंदी में छपवाकर तूल देने की कोशिश में हैं। इलाहाबाद एक बार फिर फार्म में है और वह भी पुराने तुर्रे के साथ कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó अब आगे-आगे देखिए होता है क्या।  

वे जो विज्ञान, कला और साहित्य की त्रिवेणी थे


उनके हिस्से में कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध हैं, जिनपर आज हम गर्व कर सकते हैं। उनकी कई साहित्यिक कृतियां हैं, जो हमारे लिए किसी धरोहर और प्रेरणा से कम नहीं हैं। उनकी कलाकृतियां, युवा कलाकारों के लिए किसी जरूरी अध्याय से कम नहीं। उनके लिखे नाटकों से आज भी रंगमंच गुलजार रहता है। सच कहा जाए तो वे विज्ञान, कला और साहित्य की त्रिवेणी थे। हां, वे अपने प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल थे।
प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल देश के जाने-माने भौतिकविद् थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विभाग में पढ़ाई, शोध और फिर अध्यापन के दौरान उन्होंने एक्स-रे, पार्टिकिल फिजिक्स, लिक्विड हीलियम और क्वांटम मिकैनिक्स जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उन्होंने शोध कार्य किया। वे विभागाध्यक्ष और विज्ञान संकाय के डीन भी रहे। भौतिकी के विभिन्न विषयों पर लिखी आपकी कई पुस्तकों के कई-कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें क्वांटम फिजिक्स और स्टेटिस्टिकल मिकेनिक्स पर लिखीं पुस्तकें महत्वपूर्ण हैं। प्रो. अग्रवाल अपने सहयोगियों और विद्यार्थियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उनकी सदाशयता व विद्वता का बखान करने वाले विद्यार्थी देश-विदेश में विभिन्न महत्वपूर्ण संस्थानों में बड़े पद पर कार्यरत मिल जाया करते हैं।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रो. अग्रवाल की रुचि शुरू से ही साहित्य सृजन और चित्रकला में भी रही। उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को कई महत्वपूर्ण कृतियों से समृद्ध किया है। इनमें छह कविता संग्रह-धूप की लकीरें, नंगे पैर, इस धरती पर, आदिहीन अनंत यात्रा, आकारहीन संसार एवं ढूंढ़ा और पाया, दो नाटक संग्रह-तीन अपाहिज एवं खोए हुए आदमी की खोज तथा लोटन नाटक, तीन निबंध संग्रह-आधुनिकता के पहलू, सृजन के परिवेश एवं कविता, नाटक तथा अन्य कलाएं और एक उपन्यास-बीती आप बीता आप शामिल हैं। ग्यारह बार उनकी चित्रकला की कृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। यह प्रदर्शनी इलाहाबाद, लखनऊ और दिल्ली में ही नहीं, बल्कि न्यूयार्क में भी आयोजित हुई। उनकी इस सृजन यात्रा के विभिन्न आयामों पर शोध कार्य भी हुए हैं और हो रहे हैं।
इसी आठ जुलाई को प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल की पचीसवीं पुण्यतिथि है। हम उन्हें स्मरण करते हुए सृजन परिवेश का ताना-बाना बुनने वालों की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस संदर्भ में देश में हिन्दी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुटी प्रमुख संस्था विज्ञान परिषद ने एक पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसका विमोचन आठ जुलाई को ही होना है। इस पुस्तक का सम्पादन प्रो. शिव गोपाल मिश्र व डा. बबिता अग्रवाल ने किया है। अपने महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘विज्ञान पत्रिका’ का शताब्दी वर्ष मना रही विज्ञान परिषद की यह पहल स्वगात योग्य तो है ही, यह हमें अपने समय में कुछ नया करने और अपनी विरासत से जुडऩे का अवसर भी देती है।

गुरुवार, मई 29

हंगामा-ए-पेड न्यूज चहुं ओर है बरपा



पिछले दिनों एक समाचार ने बरबस ही ध्यान खींच लिया। शीर्षक था ‘पेड न्यूज से परेशान चुनाव आयोग’। जाहिर है कि इसे पढऩा भी जरूरी लगा। हालाकि इन दिनों चुनावी माहौल में ‘पेड न्यूज’ के पैरोकारों की एक फौज तैयार हो गई है, जो तर्कों के सहारे इसे बाजार में बने रहने की जरूरत बताकर जायज ठहराने में तनिक भी देर नहीं लगाती। इनका कहना है कि पूंजी लगी है तो मुनाफे की जुगत तो लगानी ही पड़ेगी। याद आते हैं वे दिन जब पेड न्यूज को लेकर प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी के नेतृत्व में बड़ी लड़ाई लडऩे का मन बनाकर हमसब अपने समय और तथाकथित पत्रकारीय अलम्बरदारों से जूझ रहे थे। यह वही समय था जब प्रेस कौंसिल ऑफ इण्डिया की उस रिपोर्ट को जस का तस प्रकाशित करने की मांग भी की गई थी जो पेड न्यूज की जांच के बाद  तैयार की गई थी। प्रेस कौसिल ने तब रिपोर्ट का संक्षेप ही लोगों के आगे रखा था। यही वजह थी कि आरोप लगाया जा रहा था कि मालिकों के दबाव में ऐसा किया गया है।
बहरहाल हर बार चुनाव आते ही पेड न्यूज का शिगूफा सामने आ जाता है। तमाम लोग हो-हल्ला मचाने लगते हैं। इनमें वे प्रेस संगठन भी शामिल हैं जो पेड न्यूज के खिलाफ दिखने की हर कोशिश तो करते हैं, लेकिन अपनी तरफ से आज तक कोई ठोस पहल कर पाने में असफल ही रहे हैं। बहरहाल इस बार चुनाव आयोग ने बहुत पहले ही पेड न्यूज को लेकर अपनी कमर कस ली थी और इसके खिलाफ मुहिम छेडऩे की मंशा जाहिर कर दी थी। लेकिन रहा सबकुछ वही ढाक के तीन पात। चुनाव आयोग की सारी कवायदों को पलीता लगाते हुए पेड न्यूज के साथ-साथ पेड व्यूज का भी धंधा जोरों से चला। इसमें इलेक्टॉनिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को बहुत पीछे छोड़ दिया। मजेदार बात यह कि इस बार तो पूरी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जा रहा है। वैसे भी कार्पोरेटी मीडिया के चरित्र पर लांछन लगना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन हो तो यह सकता ही था कि सारा खेल इस तरह होता कि जन साधारण की निगाह में मीडिया की जो साख बनी है, वह बरकरार रह जाती। और, यह हो न सका। आज मीडिया पर बिके होने के आरोप महज राजनीतिक दल या उनकी विचारधारा से जुड़े लोग ही नहीं लगा रहे हैं, बल्कि जन-साधारण भी इनमें शामिल हैं। तय है कि मीडिया को अपनी साख बचाने या फिर उसे वापस पाने के लिए चुनावों के बाद बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
एक बार फिर उस खबर पर लौटते हैं, जिसे लेकर मैंने अपनी बात कहनी शुरू की थी। ‘पेड न्यूज से परेशान चुनाव आयोग’। इस खबर के अनुसार छह चरणों के चुनाव के बाद आयोग ने पेड न्यूज के पांच सौ बयासी मामले पकड़े हैं, जिनमें से तीन सौ इक्कीस मामलों में पेड न्यूज होने की बात सिद्ध भी हो चुकी है। रोचक तथ्य यह कि ये पांच सौ बयासी मामले महज तीन सौ सीटों के चुनाव में ही सामने आ गये। ये सारे मामले प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया को मिलाकर हैं। इनमें सर्वाधिक मामले राजस्थान में सामने आए हैं, जहां एक सौ अड़सठ मामले सामने आए और इनमें से एक सौ पन्द्रह ही पुष्टि भी हो गई। दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र और तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है।
बहरहाल आयोग के पास पेड न्यूज को पकडऩे भर की शक्ति है, इसके खिलाफ किसी तरह की सजा देने या अन्य कार्रवाई करने की कोई शक्ति है ही नहीं। आयोग किसी भी पेड न्यूज की पुष्टि होने पर उसका खर्च उम्मीदवार के चुनाव खर्च में जोड़ देता है और अखबार के मामले में प्रेस कौसिल ऑफ इण्डिया और टेलीविजन न्यूज चैनल के मामले में नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन को रिफर कर देता है। जाहिर है कि सारी कवायद टांय-टांय फिस्स हो जाती है। उम्मीदवार पर तभी कार्रवाई होगी जब उसका चुनाव खर्च तय सीमा से बाहर जाएगा और कौंसिल व ऐसोसिएशन अपने किसी सदस्य के खिलाफ जाने से रहीं। पिछला इतिहास इस बात की गवाही भी दे सकता है। वास्तव में पेड न्यूज को मीडिया घराने जितनी शिद्दत से व्यापारिक जरूरत के रूप में देखते हैं, राजनीतिक दल उतनी ही शिद्दत से  ‘राजनीतिक आवश्यकता’ के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि आती-जाती सरकारें इस पर कोई निर्णय लेने से कतराती हैं। जब से पेड न्यूज का मामला प्रकाश में आया है, तब से कई बार चुनाव आयोग सरकार के आगे इसे अपराध घोषित करने और इसके लिए सजा का प्रावधान की सिफारिश कर चुका है। लेकिन हर बार इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालकर गाहे-ब-गाहे इसके खिलाफ महज लफ्फाजी करके काम चलाया जा रहा है।
वैसे अभी तक का रिकार्ड है कि पेड न्यूज के पकड़े गए किसी भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने भी माना है कि उसके पास पेड न्यूज के कारण बढ़े चुनाव खर्च के दो मामले लम्बित हैं और वह कोई कार्रवाई नहीं कर सका है। एक मामला महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण के खिलाफ और दूसरा झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के खिलाफ है। आयोग इनके खिलाफ क्यों कोई कार्रवाई नहीं कर सका, इसका जवाब तो वह सीधे तौर पर नहीं दे सका है, लेकिन साफ जाहिर है कि सरकारी अनिच्छा और पेड न्यूज को राजनीतिक आवश्यकता मान लेना ही इसके पीछे कारण रहा है। यहां यह बता देने में कोई गुरेज नहीं है कि पिछले वर्ष संसदीय समिति ने यह सिफारिश की थी कि पेड न्यूज की रोकने के लिए चुनाव आयोग को इतनी शक्तियां तो दी ही जाएं कि वह मीडिया और उम्मीदवार दोनों को सजा दे सके। समिति ने यह भी माना था कि प्रेस कौसिल ऑफ इण्डिया और  नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि ये दोनों ही संस्थाएं पत्रकारों के अपने हित साधने के लिए बनी हैं न कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए।
बहरहाल पेड न्यूज का रोग अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले केवल राजनीतिक दलों या फिर सत्ता और मीडिया का ही गठजोड़ इसके लिए जिम्मेदार था, लेकिन अब इसमें एक तीसरे और मजबूत कोण के रूप में कार्पोरेट शामिल हो गया है। जाहिर है कि जब पूंजी और मुनाफे की मुठभेड़ में मीडिया के मिशन को पलीता लगाया जा चुका हो तो फिर पेड न्यूज के कोढ़ के समाप्त होने का इलाज सामने आने की उम्मीद करना ही बेमानी होगा।

कथाकार शेखर जोशी होने के मायने


कथाकर शेखर जोशी होने के मायने तलाशना अपने आप में सुख देने वाला रहा। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘अनहद’ के शेखर जोशी विशेषांक को पलटते हुए हर बार यही लगा कि मैं एक ऐसे जीवन से साक्षात्कार कर रहा हूं, जिसने संघर्षों के साथ रास्ते तय करते हुए कभी शिकायत की ही नहीं। सच तो यह कि हमें गर्व इस बात का कि हम उस समय में हैं जब हमारे साथ वे हैं और रचनाएं कर रहे हैं। सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी शेखर जी ने जितना लगाव अपने पीछे आने वाली पीढिय़ों को दिया है, शायद ही किसी रचनाकार ने दिया हो।
सन 1950 के बाद जिन कहानीकारों ने शिल्प और संवेदना के अन्तर्सम्बन्धों को अपने रचनाकर्म में स्थान देकर सीधे समाज से जुडऩे का प्रयास किया और आजादी की लड़ाई के दौरान के आदर्शवाद को लेकर चलने का साहस दिखाया उनमें कथाकार शेखर जोशी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। 10 सितम्बर 1934 को अल्मोड़ा जिले के ओलिया गांव में जन्मे शेखर जोशी ने रेणु, मार्कण्डेय और शिवप्रसाद सिंह की ही तरह आंचलिक पृष्ठभूमि पर ग्रामीण जीवन का बखूबी अंकन किया है। ट्रेड यूनियनों से गहरे सम्पर्क के कारण शेखर दादा की कहानियों में श्रम के प्रति गहरा सौन्दर्य और विचार दिखाई देता है। पहली कहानी ‘दाज्यू’ 1953 में दिल्ली से निकलने वाले पत्र पर्वतीय जन के वार्षिकांक में छपी थी। और, तब से लेकर आज तक अनगिनत रचनाएं कर चुके शेखर जी ने अपने समय की दुरूहताओं और सामाजिक बवंडरों से मुठभेड़ करते हुए ऐसी कई रचनाएं दी हैं, जो रचनाकारों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं हैं।
अनहद के इस अंक में शेखर जोशी पर संस्मरण, उनके साक्षात्कार, उनके परिवारी की टिप्पणी, उनकी कविता तो है ही उनके रचनाकर्म की पड़ताल करती समालोचना भी शामिल है। नाटक, सिनेमा और शेखर जोशी की कहानी, शेखर जोशी और आज के कहानीकार, युवा आलोचकों की नजर में शेखर जोशी, नयी कहानी आंदोलन और शेखर जोशी, शेखर जोशी के पत्र और चित्रवीथिका शीर्षक से उनके होने के मायनों को तलाशने की जुगत बड़ी ही महत्वपूर्ण है। जिन लेखकों ने इस जुगत में अपनी भागीदारी निभाई है, उनमें सतीश जमाली, प्रणय कृष्ण, भाल चन्द्र जोशी, नीलकांत, स्वयं प्रकाश, सूरज पालीवाल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, अनिल रंजन भौमिक, अल्पना मिश्र, प्रियम अंकित, मनोज रूपड़ा, कैलाश बनवासी आदि शामिल हैं।
संपादक संतोष कुमार चतुर्वेदी की यह टिप्पणी मायने रखती है कि ‘इक्का-दुक्का रचनाकारों को छोडक़र प्राय: वे सभी रचनाकार शेखर जी पर लिखने को तैयार हो गए, जिनसे मैंने सम्पर्क किया। क्या बुजुर्ग, क्या युवा, वे सबके पसंदीदा हैं, अजातशत्रु हैं।’ वास्तव में शेखर जोशी हर पीढ़ी के लिए प्रिय रचनाकार तो हैं ही, वे बड़ी ही संवेदना के साथ सबके साथ जुड़े भी हैं। मैं इस बात का कई बार साक्षी रहा हूं कि उनसे मिलने शहर बाहर से कोई भी रचनाकार आता है तो वे इस गर्म जोशी से मिलते हैं कि वह बार-बार उनके पास आना चाहे। ‘अनहद’ के इस प्रयास की जितनी भी सराहना की जाए वह कम है। संपादक व उनकी टीम को बधाई।

सोमवार, फ़रवरी 17

बड़ी कठिन है डगर पनघट की...

जनवादी लेखक संघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने एलान किया कि वे अपनी लेखक बिरादरी को एक साथ काम करते देखना चाहते हैं। उन्होंने लेखक बिरादरी के तमाम संगठनों खासकर प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच को साथ लेकर उन ताकतों का सामना करने की बात कही है, जो गाहे-ब-गाहे हमारी सामाजिक संचेतनाओं को चुनौती देती रहती हैं। दूधनाथ सिंह ने यह भी कहा है कि वे बरास्ते जनवादी लेखक संघ, रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रजातांत्रिक शक्तियों को मजबूत करने का भी काम करेंगे। हम सब की शुभकामनाएं और बिना शर्त सहयोग उनके साथ होना चाहिए।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह सब क्या इतना आसान है? सच यह है कि लेखकों के बीच बिरादरीवाद इतनी गहराई तक है कि पूछिए ही नहीं। एक संगठन के कार्यक्रम में स्थानीय स्तर पर अपने-अपने संगठन से बाहर निकलकर भागीदारी निभाने वाले तो मिल जाएंगे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होते देख पाना दूर का सपना ही है। लेखकीय संगठनों का एक और रवैया है कि वे पूरी लेखकीय बिरादरी को अपने साथ लेकर चलना ही नहीं चाहते। कोई लेखक अगर उनके संगठन का सदस्य नहीं है या फिर उनकी विचारधारा से अभिप्रेरित किसी अन्य संगठन का भी सदस्य नहीं है तो उनके किसी काम का नहीं होता। वे न तो उसे अपने साथ बैठाना पसंद करते हैं और न ही अपने आयोजनों में भागीदारी का मौका ही देते हैं। जो उनके द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा के भीतर आ गया वही अच्छा लेखक है, बाकी सब नाकारा। मजेदार बात यह कि लेखकीय संगठन के लोग किसी नए लेखक की पीठ तभी ठोंकने को तैयार होते हैं, जब तक वह उनके खेमे में बतौर सदस्य नहीं आ जाता। ये लोग खेमे के बाहर के लेखक की रचना पर चर्चा तक करने से गुरेज करते हैं।
पुराने दिनों की स्वस्थ्य परम्पराएं गायब हैं। जब संगठनों के बीच रचनात्मकता को आगे लाने और उससे जुड़े रहने की होड़ लगी रहती थी और लिखने वाले का सम्मान होता था। कोशिश होती थी कि हर अच्छा रचनाकार उनके संगठन में आ जाए। अब उखाड़-पछाड़ और स्वीकार-नकार की होड़ में शामिल लोग लिख कम रहे हैं, बयान ज्यादा दे रहे हैं। ‘ले दही-दे दही’ जुमले के अनुयायी एक दूसरे की पीठ थपथपाकर इतिश्री कर ले रहे हैं। लेखकीय संगठनों में क्रीमी लेयर और उसके नीचे के लोग साफ तौर पर अलग-अलग दिखाई देते हैं। क्रीमी लेयर में शामिल लोग तमाम हो-हल्लों से दूरी बनाकर चलने में ही ठीक समझते हैं। यही वजह है कि स्थिति उतनी बेहतर नहीं है, जितनी होनी चाहिए।
लिहाजा यह तय है कि दूधनाथ जी को अपने एलान को अमली जामा पहनाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। दूधनाथ जी के पास यह क्षमता तो है ही कि वे इन तमाम दुरूहताओं से निपटकर लेखकीय संगठनों के इतिहास में कुछ नए पृष्ठ जोड़ सकें। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिन हमें लेखकीय संगठनों को बेमानी लफ्फाजी से मुक्त होते और रचनात्मकता से जुड़ते और उसका सम्मान करते दिखाएंगे। अगर ऐसा होता है तो सच में हम सब रचनात्मकता के नए अध्याय लिखे जाते देखेंगे और प्रजतांत्रिक मूल्यों को मजबूत होते हुए भी। आमीन......।    




   


......वे जो  हमेशा अपने समय का सच रचते रहे 

कथाकार अमरकांत से धनंजय चोपड़ा की बातचीत 
वे अपने समय को बखूबी जीते थे, उसमें रम जाते थे, उसकी मिठास, कड़ुवाहट, उठा-पटक, उहापोह और जीवन संघर्ष का अनुभव लेते थे और फिर डिप्टी कलक्टरी, जिन्दगी और जोंक, बस्ती, हत्यारे, मौत के नगर, दोपहर का भोजन, सुन्नर पाण्डे की पतोहू, आंधी, इन्हीं हथियारों से जैसी सैकड़ों कालजयी कृतियां रच डालते थे। वे अपने जीवन संघर्षों से जूझते हुए मिलते थे, लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं आती थी। वे जोश के साथ मुलाकात करते थे और लोगों को आत्मविश्वास भेंट कर देते थे। वे उम्र के कई अस्सी पड़ाव पार कर चुके थे, लेकिन किसी युवा रचनाकार से अधिक रचनाकर्म करते थे। यह सिर्फ इसलिए कि वे अमरकांत थे। वरिष्ठï कथाकार-पत्रकार अमरकांत!
प्रेमचन्द के बाद अगर किसी कहानीकार पर निगाह ठहराने का मन करता है तो वे अमरकांत हैं। आजादी की लड़ाई केदिनों से ही उन्होंने जिस बेबाकपन को अपनाया वह किसी भी दौर में लिखते हुए भी उनकी पहचान बना रहा। नई कहानी के दौर से गुजरते हुए ही अमरकांत ने अद्ïभुत कलात्मक रचनायें देना शुरू कर दिया था। ‘बस्ती’ कहानी अगर देश के भविष्य पर बेबाक टिप्पणी करती है तो ‘हत्यारे’ अपने समय के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने और पीढिय़ों में आयी हताशा से साक्षात्कार कराती है। डिप्टी कलक्टरी अपने समय के एक बड़े सच को उजागर करती है तो गगनबिहारी और छिपकली, बौरइया कोदों जैसी कहानियां ढोंग और अवसरवादिता-काईंयापन पर चोट करती मिलती हैं।
अमरकांत अपनी रचनाओं में  इस बात से बखूबी परिचित मिलते हैं कि इस नंगे-भूखे देश में सबकुछ आशा और निराशा केबीच पेण्डुलम की तरह झूलता ही रहेगा। वे ‘व्यंग्य’ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे और उसकी मार को दवा की तरह। भले ही अमरकांत सामाजिक-राजनीतिक उठापटक से अपने को तटस्थ रखते हों, लेकिन उनकी रचनाएं ऐसा नहीं कर पातीं और हर एक विद्रूपता के खिलाफ चीखती, ‘इन्हीं हथियारों से’ वार करती और सबकुछ ठीक हो जाने की उम्मीद जगाती मिलती हैं। अनगिनत कालजयी कृतियों देने वाले अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार सहित देश के कई बड़े सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। साहित्यकारों के पुरस्कार दिये जाने पर वे टिप्पणी करते हुए सहज भाव से कहते हैं कि ‘कोई लेखक पुरस्कार पाने के लिए थोड़े ही लिखता है। यह भी जान लीजिये कि कोई भी सम्मान या पुरस्कार किसी लेखक को बड़ा नहीं बनाते। प्रेमचन्द, रेणु, निराला बिना किसी पुरस्कार के ही अमर हैं। हां, यह अवश्य है कि पुरस्कार या सम्मान पाने वाले लेखक की अपने समाज और पाठकों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’
कथाकार अमरकांत से यह बातचीत उस लम्बी बातचीत का एक हिस्सा है, जिसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेन्टर ऑफ मीडिया स्टडीज की मीडिया रिसर्च सेल में धरोहर के रूप में सहेजने के लिए किया गया था।  हमें पता था कि अमरकांत जी से बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है तो थमने का नाम ही नहीं लेता। उनके पास आजादी के संघर्ष का आंखों देखा और भोगा इतिहास है तो हिन्दी पत्रकारिता के मंजावट वाले दिनों का अनुभव भी है। वे साहित्य की रचना ही नहीं करते रहे हैं, बल्कि रचनाकारों की कई-कई पीढिय़ां तैयार करने का दायित्व भी उन्होंने निभाया है। यही वजह थे कि हम वीडयिो कैमरा लगाकर बैठ गए और वे बोलते रहे .... अपने समय का इतिहास और  तैयार होते रहे आने वाली कई पीढिय़ों के लिए कई -कई अध्याय। प्रस्तुत हैं उनसे हुई इसी लम्बी बातचीत के कुछ अंश:

पहली कहानी कब लिखी?
प्रश्न सुनते ही मुस्कराते हैं अमरकांत जी। कुछ याद करते हुए कहते हैं- पढ़ाई के दिनों में शरतचन्द को पढक़र कुछ रोमांटिक कहानियां लिखी थीं, लेकिन वे सब कहीं छपी नहीं। वह समय 1940 के आस-पास का रहा होगा। छपने वाली पहली कहानी ‘बाबू’ थी, जो आगरा से निकलने वाले समाचार पत्र ‘सैनिक’ के विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। शायद 1949-50 में (कुछ याद करते हुए)। दुखद यह रहा कि इस कहानी की न तो मेरे पास स्क्रिप्ट ही बची और न ही इसका प्रकाशित रूप। गुम गई ये कहानी। यही वजह है कि मैं हमेशा अपनी पहली कहानी ‘इंटरव्यू’ को कहता हूं, जो पहले प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में मैंने पढ़ी और बाद में 1953 में ‘कल्पना’ में प्रकाशित हुई। इसी कहानी के बाद मैं सम्मानित लेखकों की श्रेणी में शामिल हो गया। फिर तो सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है।
 
आज के कथा लेखकों और उनकी रचनाओं को आप किस रूप में पाते हैं? 
नए लेखकों के सामने उनका समय और उसकी सगााइयां हैं। इन दिनों नई परिवर्तित परिस्थितियां हैं, जो हमारे शुरुआती दिनों से एकदम भिन्न हैं। ऐसा नहीं है कि नए लेखक जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। नई-नई समस्याओं पर लगातार लिखा जा रहा है। कई लेखक तो अपने समय से जूझ कर बेहतर कृतियां देने में सफल भी हो रहे हैं। हां, यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि बहुत से नए लेखक हड़बड़ी में हैं। मेरा मानना है कि मेहनत के बिना अ'छी रचना नहीं लिखी जा सकती है। शैली और भाषा में नए प्रयोग की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन ऐसा कम ही लेखक कर रहे हैं। एक बात और, अब हमारे समय जैसा सहज और सरल समय नहीं रहा और यही वजह है कि नई पर्स्थितियों में रचनाकर्म कठिन होता जा रहा है।

और आलोचकों की परफार्मेंस पर आपकी क्या राय है?
साहित्य में आलोचना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। आलोचना का मतलब सिर्फ आलोचना करना ही नहीं होता, जैसा कि प्राय: देखने-पढऩे को मिलता है। पहले के टीकाकार जो काम करते थे, वही आलोचकों करना चाहिये। अब देखिये, कपिल मुनि के सांख्य दर्शन की मूल प्रति है ही नहीं। उसकी टीका लिखी गयी। वही मिलती है। उसी से इस दर्शन को समझा जाता है। आलोचकों को चाहिये कि वे बेहतर कृतियों को खोजकर उनकी व्याख्या करें, टीका लिखें। मैं यह बात टुटपुंजिए आलोचकों के लिए नहीं कह रहा हूं। गम्भीर रूप से आलोचना कर्म में जुटे लोगों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। कुछ युवा आलोचकों ने उम्मीद जगा रखी है।  

निष्क्रिय पड़ते जा रहे लेखकीय संगठनों को आप क्या सलाह देंगे?
मैं यह नहीं कहूंगा कि वे निष्क्रिय हो गये हैं। वे सब अपनी नई मान्यताओं के अनुरूप काम कर रहे हैं। देखिए, हमारे समय में ये संगठन बहुत अधिक सक्रिय हुआ करते थे। मैं प्रगतिशील विचारधारा का नहीं था, लेकिन ये प्रगतिशीलियों की सक्रियता ही थी कि वे मुझे अपनी ओर ले गये। मैंने अपनी पहली कहानी आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में ही सुनाई। आगरा के बाद जब इलाहाबाद आया तो यहां भी इस संगठन के लोगों ने मुझे अपने से जोड़ लिया। यहां उन दिनों परिमल संगठन भी बहुत सक्रिय था। दोनों ही संगठनों के बीच लेखन में आगे निकल जाने की होड़ मची रहती थी। स्वस्थ्य विमर्श होते थे। मेरा मानना है कि मतभेद होना गलत नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है। इसी से नये रास्त निकलते हैं। संगठनों में होने वाले विमर्श नई पीढ़ी को तैयार हेने का मंच और अवसर उपलब्ध कराते हैं। संगठनों को चाहिये कि मतैक्य न होते हुए भी एक दूसरे का सम्मान करते हुए नई पीढ़ी के रचनाकारों को आगे बढ़ाने के लिए काम करें।

आपने लगभग चालीस वर्ष पत्रकारिता की है। तब और अब की पत्रकारिता में क्या फर्क महसूस करते हैं? 
बहुत फर्क आया है। वेतन के मामले में कई अखबारों व पत्रिकाओं ने सार्थक पहल की है। हमारा समय वेतन के मामले में इतना बेहतर नहीं था। हमने आपातकाल भोगा है और उन दिनों पत्रकारों के समक्ष आने वाले संकट को भी। फिलहाल अब  पत्रिकाओं और अखबारों की प्रस्तुतियों और कंटेंट के वैविध्य में तो ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं,जिनकी कल्पना भर हम अपने समय में करते थे। पत्रकारों के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं। ठीक उसी तरह की चुनौतियां हैं, जैसी लेखकों के सामने हैं। (अमरकांत जी टीवी पत्रकारिता पर कुछ नहीं कहते, शायद कहना नहीं चाहते।)  

आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहने वाले अमरकांत से आज के हालात पर टिप्पणी मांगी जाये तो क्या होगी?
इस प्रश्न पर कुछ देर संयत रहने के बाद अमरकांत जी हंसते हुए कहते हैं-अब भ्रष्टाचार और घोटालों वाले इन हालातों पर क्या टिप्पणी की जाये। हाल के आंदोलन अपने समय को परिभाषित करने के लिए काफी हैं। बदली परिस्थितियों में राजनीति और उसके मानक बदल गये हैं। लोगों की आकांक्षायें बढ़ी हैं और जागरूकता भी। हमारे देश की व्यवस्था जनतंत्र को संतुष्ट कर पाने में विफल सी हो रही है। गांव के लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ गयी है तो शहरी लोगों में राजनीति के प्रति ऊबाहट बढ़ी है। हम ऐसे समय में आ गये हैं जब लोकतंत्र में जनता के अधिकारों की गारंटी की लड़ाई जरूरी हो गई है। ऐसे में मुझे लगता है कि देश में एक सशक्त लोकपाल की नियुक्ति अब बहुत जरूरी हो गई है। एक बात और जिस देश में प्रगतिशील जनतंत्र नहीं होता वह कमजोप पड़ता जाता है।

एक लेखक के रूप में आप सरकार से क्या अपेक्षा करते हैं?
हां, यह सवाल बहुत जरूरी है। मैं जब सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार लेने रूस गया था तो मुझे वहां टालस्टाय और चेखव के घर देखने का मौका मिला। वहां की सरकार ने दोनों ही लेखकों के घर, उनकी चीजों, उनकी किताबों और उन पर लिखी गयी किताबों को धरोहर के रूप में सम्भालने की जिम्मेदारी उठी रखी है। हमारे देश में यह किसी से छिपा नहीं है कि महादेवी, पंत और निराला के घरों और उनकी चीजों का क्या हश्र हुआ है। सरकार ने कभी इस ओर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी है। अरे भाई, किसी लेखक को पुरस्कार या सम्मान दे देने भर से कुछ नहीं होता। पुरस्कार या सम्मान तो लेखन के लिए होता है। सरकार को चाहिये कि बेघर लेखक को घर देने, प्रकाशकों से समय पर उचित रायल्टी दिलाने और उन्हें आर्थिक तंगी से उबारने  की दिशा में भी कदम उठाने की पहल करे और ठोस नीतियां बनाये। सुना है कि बंगाल में ऐसी कोई नीति बनी है, लेकिन पता नहीं यह कितना सच है। हिन्दी लेखकों के लिए तो इस तरह की अब तक कोई पहल नहीं हुई है। सरकार को नए लेखकों और शोधार्थियों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। पढऩे और लिखने की प्रवृत्तियों को जितना प्रत्साहन मिलेगा उतना ही बेहतर समाज और देश हम बना पायेंगे।

आजकल आप क्या लिख रहे हैं? 
नियमित लेखन नहीं हो पा रहा है। ‘एक थी गौरा’ उपन्यास को पुरा करने में जुटा हूं। एक वर्ष में पूरा कर लेने की योजना है। पत्रकारिता पर भी एक उपन्यास लिखने की योजना बनी है। ‘खबरों का सूरज’ नाम के इस उपन्यास में मैं ‘सैनिक’, ‘उजाला’, ‘भारत’ व ‘अमृत पत्रिका’ आदि दैनिक व साप्ताहिक पत्रों व मित्र प्रकाशन की ‘मनोरमा’ पत्रिका में काम करते हुए मिले अनुभवों को पाठकों के साथ बाटूंगा। यह उपन्यास पत्रकारों के संघर्ष और संघर्ष के दौरान यूनियन के नेताओं से मिले धोखे पर आधारित होगा।

एक लम्बी बातचीत के बाद भी उनका चेहरा एक स्फूर्तिभरी दमक लिए हुए दिख रहा था। वे बात करते वक्त यह अहसास ही नहीं होने देते हैं कि हम एक बड़े लेखक के साथ हैं, जिसे देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है और अनगिनत शोधकर्मी जिनपर शोध कर रहे हैं। वे जिस अंदाज में बात करते हैं, वह अपने आप में एक अलग शैली का निर्माण करता है। जीवन की विषमताओं पर लिखते समय या फिर जीवन संघर्ष को चुनौती के रूप में लेते समय, हर बार यही लगता है कि वे अपने यूवा दिनों का स्वतंत्रता आंदोलनकारी रूप को अभी तक भूल नहीं पाये हैं। दूसरों के दुखों, कष्टों, संघर्षों, दुविधाओं को नितांत निजी मानकर रचना कर देने वाले अमरकांत चलते-चलते अपने समय के सच से मुठभेड़ करने की सीख देना नहीं भूलते।