मंगलवार, जनवरी 13

पेरिस,पत्रकारिता और पस्त होती दुनिया


साल के जाते-जाते पाकिस्तान के पेशावर शहर में मानवता को धता बताती घटना ने पूरी दुनिया का दिल दहला दिया था और तब दुनिया भर की पत्रकारिता ने इस घटना का ब्योरा देते हुए चीख-चीख कर मानवता पर मंडराते खतरे के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। हर संवेदनशील आदमी इस घटना की निंदा करता मिल रहा था। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों ने इसके फिर न दोहराए जाने की दुआ भी की थी। पर किसे पता था कि कुछ ही दिनों के बाद पत्रकारिता के ऊपर भी इसी तरह का हमला होने वाला है। पेरिस की व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ के पत्रकारों की शहादत ने दुनिया की समूची पत्रकारिता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब अभिव्यक्ति की आजादी के दिन लद गए? क्या अपने समय, अपने समाज और खुद अपने पर हंसने और व्यंग्य करने पर पाबंदी लग जाएगी? वैसे सच कहा जाए तो इस तरह की शुरूआत कुछ वर्षों पहले ही हो चुकी थी। याद कीजिए जब अपने देश में एम.एफ. हुसैन की एक पेंटिंग को लेकर हंगामा बरप गया था और एक पुराने प्रकाशित कार्टून को लेकर संसद का अहम समय हंगामे की भेंट चढ़ गया था। बहरहाल देश दुनिया में इस तरह की कई घटनाएं हैं जो इस बात की तस्दीक कर सकती हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी हमेशा से निशाने पर रही है। लेकिन, इस बार जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना नहीं की गई थी।
अपने शायर अकबर इलाहाबादी ने बरसों पहले बड़े ही शान और विश्वास के साथ लिख दिया था कि - ‘जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’। बार-बार स्तब्ध कर देने वाले इस समय में न जोने क्यों कभी-कभी अकबर की ये पंक्ति बेमानी से लगने लगती है। लेकिन, जिस एक पंक्ति के सहारे हमारी पत्रकारिता हर तरह के विरोध से जूझती आई हो उसे इस तरह झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। यही वजह है कि देश-दुनिया की स्तब्ध पत्रकारिता जगत ने एकबार फिर सच व इंसाफ के लिए जूझते रहने का जज्बा दोहराया है। मीडिया के सारे उपक्रम इस घटना के विरोध में एकजुट तो हैं, लेकिन उन्हें राजनीति और समाज से जो मुखर सम्बल मिलना चाहिए था, वह गायब है। साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी भी चुप्पी साध लेने में ही भलाई समझ रहे हैं। शिक्षा जगत भी इस मुद्दे पर लगभग पल्ला झाड़े खड़ा है। आखिर ऐसा क्यों? उत्तर हर प्रश्न समझने वाले के पास है।
वास्तव में हमारा यह समय बार-बार यह सोचने पर मजबूर करता है कि चूक कहां हो रही है। ऐसे समय में पता नहीं यह कहना ठीक है या नहीं, लेकिन कहे बिना रहा भी नहीं जाता कि क्या पत्रकारिता के मिशनरी मानकों और अभिव्यक्ति की आजादी पर लगते सवालिया निशानों पर हमें बदलती दुनिया और बदलते समय के हिसाब से सोचना नहीं चाहिए? यही नहीं एक बार फिर ‘सेल्फ रेगुलेशन’ की आवाज भी उठने लगी है। अब देखिए न शार्ली एब्दो पर हमले से घबराए टर्की के एक अखबार ने तत्काल यह घोषणा कर दी कि आगे से हम विवादित कार्टून नहीं छापेंगे। अब यह कौन तय करेगा और कैसे तय करेगा कि कौन सा कार्टून विवादित है और कौन सा नहीं। कार्टून विधा के माहिरों की मानें तो हर कार्टून किसी न किसी व्यक्ति या घटना या विचार पर कटाक्ष करता ही सामने आता है। तो फिर वह हर उसके लिए विवादित ही होगा जिसके खिलाफ उसे तैयार किया गया है। तो क्या कार्टून ही बनने बंद हो जाएं? या फिर कार्टून छापने से पहले सेंसर बोर्ड से अनुमति ली जाए? तो क्या सेंसर बोर्ड से पारित कार्टून सबको मान्य होंगे और उनपर विवाद नहीं होगा। पेंच दर पेंच और जवाब कुछ भी नहीं।
समाजशास्त्री और सामाजिक अलम्बरदार इसे माने या न माने पर सच यही है कि राजनीतिक व्यवस्थाओं ने हमारे अपने समाज को अधिक असहिष्णु, दुरावग्रस्त, कट्टर धार्मिक और जातिगत प्रतिस्पर्धा रखने वाला बना दिया है। इसके लिए हमारी वे सामाजिक संस्थाएं भी दोषी हैं, जिनको हमने अपने समाज को बनाने, मांजने और गतिशील बनाने के लिए मान्यता दे रखी है और वे इनमें से कोई भी दायित्व सही ढंग से नहीं निभा पा रही हैं। यह कहना भी गलत न होगा कि टेक्नोलॉजी ने इन तथाकथित सामाजिक विशेषताओं के पुष्पित-पल्लवित होने का मौका दिया है। और, जब तक हम ऐसे सामाजिक ताने-बाने को बुनते रहेंगे या इनकी बुनावट से उदासीन बने रहेंगे तब तक किसी न किसी चित्रकार को एम.एफ.हुसैन की तरह देश छोडक़र जाते रहना पड़ेगा, किसी न किसी लेखक को अरुण शौरी के लेख पर हुए हल्ले की तरह का हल्ला सहना पड़ेगा, नेहरू और अम्बेडकर पर बने पुराने कार्टून की तरह किसी और कार्टून पर संसद का समय जाया होता रहेगा और शार्ली एब्दो की तरह किसी और अखबार या पत्रिका पर हमले जारी रहेंगे। सबको सम्मति दे भगवान...।

रविवार, जनवरी 11

चलो, एकबार हम भी ‘विवादित’ हो जाएं


लिक्खाड़ों की दुनिया में विवादों में बने रहने का एक अजीब सा नशा है। इस साहित्यिक कही जाने वाली दुनिया में विवाद में रहने के मायने है कि आप केन्द्र में हैं और लोगों की नजर में हैं। विवाद में बने रहने के मायने यह भी हैं कि आप तथाकथित बड़ों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं। ‘विवाद की साइज’ आपकी ‘हैसियत की साइज’ तय करती है। अरे वह लेखक ही क्या जिसके आचार, व्यवहार, सोच पर कभी विवाद ही न हुआ हो। अगर लिखे पर कोई विवाद नहीं हुआ तो कहे पर विवाद तो होना ही चाहिए। और, अगर कहे पर भी विवाद नहीं हुआ तो चरित्र पर ही विवाद हो जाना चाहिए। किताब छपे तो विवाद, पुरस्कार मिले तो विवाद, प्रेम करे तो विवाद , किसी पार्टी के नेता से हाथ मिला ले तो विवाद,किसी जुलूस में जाए तो विवाद, न जाए तो विवाद। विवाद होगा तभी तो संवाद की गुंजाइश बनेगी। विवादों में बने रहने में माहिर लोग पहले ही ताड़ लेते हैं कि मीडिया में कौन सा विवाद कितनी दूर तक उछलेगा और कौन दोतरफा टीआरपी का मजा देगा। इसी आधार पर वे सधे हुए अंदाज में कदम बढ़ाते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि हमारी दुनिया विचारों की दुनिया है, तरह-तरह के विचार आपस में टकरायेंगे नहीं तो मंथन होकर सार्थक चीजें बाहर कहां से आयेंगी।
बहरहाल साहित्य में विवाद, विवादियों, विवादपरस्त और विवादग्रस्तों को देखकर कई बार तो विश्वास करना ही मुश्किल हो जाता है कि ये लोग एक ऐसी दुनिया से सम्बन्ध रखते हैं, जिसे सबसे अधिक संवेदनशील समझा जाता है। तरह-तरह के वादों में बंटे साहित्य समाज के लोग सदे-बदे अंदाज में जब अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होते हैं, तो यह भांपना मुश्किल होता है कि सच क्या है और झूठ क्या है। वैसे मीडिया के विस्तार के साथ ही साहित्य में विवादों को विस्तार मिला है और विवादों की कई-कई वैराइटी हमारे सामने आयी है। यही नहीं धुरंधर विवादबाजों के साथ कई नए-नए रंगरूट विवादबाज भी पैदा होते जा रहे हैं। अगर यह कह दिया जाए कि साहित्य में छत्रप कह जाने वाले लोगों के पास विवाद फैलाने वालों की फौज है तो गलत नहीं होगा। देश की राजधानी से लेकर प्रदेशों की साहित्यिक राजधानियों में इनके फ्रेंचाइजी एजेंट मौजूद रहते हैं और इशारा पाते ही कूद-फांद मचाना शुरू कर देते हैं। विवाद पर बयान, विवाद पर संगोष्ठी, विवाद पर प्रदर्शन, विवाद पर टिप्पणियों का प्रकाशन, विवाद को बनाए रखने के लिए लगातार आलेखों और पत्रिकाओं में सम्पादक के नाम पत्र लेखन आदि का काम इन्हीं प्रेंचाइजी एजेंटों के जिम्मे होता है। मजेदार यह कि विवादों में बने रहने के लिए कई छुटभइये कलमकार जोकरी की हदें पार कर जाते हैं।
देश की कई पत्रिकाएं भी साहित्य में विवादों को पैदा करने और उसे लगातार जिंदा रखने की कवायद करती रहती हैं। पत्रिकाओं के इतिहास को पलटें तो साहित्य के कई विवाद बिखरे हुए मिल जाते हैं। फर्क बस इतना है कि इन एतिहासिक दस्तावेजों में साहित्य के विवाद को दर्ज करने का काम किया गया है। विवाद को जन्म देने और उसे आगे बढ़ाने का काम कम ही दिखता है। दूसरी तरफ आज की लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएं गाहे-बगाहे ऐसे कारनामे करती रहती हैं कि साहित्य समाज में बेमानी बहसें चलती रहें और उनके चहेते लेखक चर्चा में बने रहें। बहरहाल अपना शहर तो है ही इस कार्य में माहिर। वादों और विवादों को जन्म देने और उसे पुष्पित-पल्लवित करने में जितना योगदान अपने शहर इलाहाबाद का उतना शायद किसी का नहीं।

रविवार, अक्टूबर 5

ओह,लाल बत्ती पर रुकने लगा है शहर!


कुछ दिनों पहले एक इलाहाबादी साहित्यकार के हाथ में स्मार्ट फोन देखकर बैचेनी बढ़ी थी। लगा था कि अब छपे हुए शब्दों पर आस्थाएं मूल स्थान पर से ही डिगने लगेंगी। स्मार्ट फोन के मायने ही हैं कि आपके पास नए जमाने के ऐसे ‘एप्स’ आ जाते हैं कि आप महज ‘सेल्फी’ पर विश्वास करके ‘सेल्फिश’ होने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। हाला कि इलाहाबादी शब्दकोश में इन सेल्फी और सेल्फिश जैसे शब्दों का कोई स्थान ही नहीं है और न ही इन जैसे शब्दों के मायने तलाशने और पाने की जरूरत ही महसूस की जाती है, लेकिन स्मार्ट फोन के संक्रमण का क्या भरोसा। अच्छे भले इलाहाबादी साहित्यकार को बदल दे तो कोई आश्चर्य नहीं। वैसे धक्का तो तब लगा जब मांने उन साहित्यकार को एक महिला रचनाकार के बगल में खड़े होकर सेल्फी खींचते देख लिया। कई दिनों तक सोचता रहा कि क्या अपना इलाहाबाद भी बदलाव की बयार के संग बह चला है क्या?
अभी इस सेल्फिश ख्याल से बाहर आ पाता कि अमरीका से खबर आई कि अपना इलाहाबाद भी स्मार्ट होने जा रहा है। मुआ ‘स्मार्ट’ शब्द एक बार फिर हमारे सामने था। अब आप ही सोचिए कि जो आदमी एक इलाहाबादी के पास स्मार्ट फोन से अपने इलाहाबाद में बदलाव की बयार बहते देख घबरा रहा हो, उसे समूचे शहर के स्मार्ट होने की खबर मिल जाए तो क्या हो। बहुत साल पहले दिल्ली बसने का ख्याल आया था। गया भी। लेकिन, भागती-दौड़ती दिल्ली में खुद को फिट न कर पाने पर यह कहकर वापस हो लिया था कि हम जैसे इलाहाबादियों के लिए यह शहर नहीं है। कुछ ज्यादा ही ‘स्मार्ट’ लोग रहते हैं यहां। अब देखिए उसी इलाहाबाद को ‘स्मार्ट’ बनाने पर आमादा हो गए हैं लोग। अरे जरा सोचिए कि कहीं यह हमारी इलाहाबादियत को छीनने की साजिश तो नहीं? स्मार्ट-स्मार्ट कहकर इन्होंने कई शहरों को फेसबुकिया टाइप के शहरों में तब्दील कर दिया है। बस मैसेजों में सिमटी रिश्तेदारी और कुछ लाइक्स में सिमटकर रह गई दोस्तियां। बड़े- बुजुर्गों की नजर में स्मार्टनेस तो अपना काम-काज समय से और बढिय़ा से कर लेने से ही आ जाती था और किसी टेक्नोलॉजी में क्या दम जो किसी शहर को स्मार्ट बना सके। लेकिन अब कौन इसे मान रहा है। अमरीका से खबर आई है तो लोगों को विश्वास करना पड़ रहा है। इसी बीच मैं जापानी शहर क्योटो की तरह होने जा रहे अपने सहोदर शहर बनारस भी हो आया। ढलुआ रिक्शे पर बैठकर यह विश्वास हो ही नहीं पाया कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान टेलीविजन में दिख रहे क्योटो शहर की तरह हमारा बनारस भी हो जाएगा।
आखिर ऐसे कैसे बदल सकते हैं लोगों की बरसों पुरानी रवायतों को और मानसिक ढंाचों को? कैसे कोई शहर अपने होने को झुठलाकर दूसरे शहर की नकल बन सकता है? बन क्यों नहीं सकता। जब अपना इलाहाबाद सारी ऐंठ को दरकिनार कर लाल बत्ती पर खुद-ब-खुद रुकने लगे तो कहा जा सकता है कि बदलते समय में अब वह सबकुछ हो सकता है, जिसकी कल्पना हम नहीं कर पा रहे हैं। हां, यह बदलाव किस हद तक और किस किस्म का होगा, यह अभी से कह पाना मुश्किल है। पहली बार जब लाल बत्ती पर ठिठकते इलाहाबाद को देखा तो डर सा लगा था कि अरे यह क्या हो गया अपने शहर को। न कोई ट्रैफिक पुलिस और न कोई वसूली पर लगा सिपाही। फिरभी शहर क्यों ठिठक कर खड़ा हो गया। कहते हैं कि बदलते समय के साथ जो नहीं बदलता उसे समय हाशिए पर ढकेल कर आगे निकल जाता है। लेकिन इलाहाबाद और बनारस जैसे शहरों ने लाख कोशिशों के बावजूद अपने आप को नहीं बदला और अपने-अपने हिस्से की जीवंतता को बनाए रखने की हर संभव कोशिश की है। शहर के अनियोजित विस्तार ने भले ही शहर की संस्कृति को कुछ हद तक प्रभावित किया हो लेकिन शहर अपनी सारी सरकारी-गैरसरकारी दुरूहताओं को अपनी अलमस्त अदाओं से किनारे ढकेलकर आगे बढ़ता आया है। ऐसे में इसके एकाएक स्मार्ट हो जाने पर शक तो होता ही है।
लाल बत्ती पर कुड़बुड़ाते एक ठेठ इलाहाबादी का यह कहना कि  ‘साले, सब के सब पगलाय गए हैं। अब एका (इलाहाबाद को) दिल्ली बनाय पर तुले हैं। अब इनका कउन समझाय कि ई इलाहाबाद है। बड़े-बड़े तीसमार खां आएं और चले गयें। एका कुछ नय बिगाड़ पायें। देख्यो, चार दिन के बाद ई सब लाइट-लुईट, लाल-हरा सब टांय-टांय फिस्स होय जाई।’ मायने रखता है।  ईश्वर करे....। आमीन।

बुधवार, अक्टूबर 1

मरती लोक कलाएं और सिसकते कलाकार....


याद कीजिए वे दिन जब हमारे समाज में मनोरंजन और जनसंचार का काम हमारी लोक कलाएं ही किया करती थीं। लोक गीत, लोक कथाएं, लोक नृत्य, लोक आख्यान और लोक चित्र कला, यही वे सब उपक्रम थे, जिनके सहारे हमारे पूर्वज अपने समाज की बनावट और मंजावट का काम किया करते थे। आज भी हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग इन्हें सहेजने में जुटा हुआ है। यह बात और है कि सरकारी सहयोग और आधुनिक सामाजिक मान्यताओं के उपेक्षात्मक रवैये ने इन्हें हाशिए में रख छोड़ा है और अब इनका हमारे बीच होना मात्र एक अनुष्ठान भर रह गया है।
पिछले दिनों इण्डियन फोक आर्ट फेडरेशन की एक संगोष्ठी में देश भर से आए लोक कलाकारों के बीट उपस्थित होने का मौका मिला। वहां उपस्थित हर कलाकार के पास अपने-अपने दुख थे, जिन्हें वह अपनों के संग बांट लेना चाहता था। इसी संगोष्ठीमें हमें फेडरेशन की ओर से ‘मरती लोक कलाएं और सिसकते कलाकार....’ शार्षक से एक पत्रक मिला। इस पत्रक में लोक कलाओंं और लोक कलाकरों की दशा का बड़ा ही मार्मिक बखान किया गया है। जो लोग लोक कलाओं और कलाकारों को करीब से जानते हैं उनको इस पत्रक पर सहजता से विश्वास हो जाएगा, लेकिन जिनके लिए लोक कलाएं जीवन और समाज के लिए जरूरी नहीं बल्कि मनोरंजन भर का एक साधन मात्र हैं उन्हें शायद ही इस पत्रक की सच्चाई और पीड़ा पर विश्वास हो सके। मैं ऐसे कई विद्वानों को जानता हूं जो लोक कलाओं के होने और उनकी जरूरतों पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब उनके हक के लिए आवाज उठाने की बात आती है तो कन्नी काट जाते हैं। जब तमाम विद्वानों का यह हाल है तो फिर आम जन की तो बात ही छोडि़ए। वास्तव में सरकारों ने जो भी योजनाएं ऐसे कलाकारों के लिए बनाई हैं, उनकी मलाई कुछ लोग ही चट कर जाते हैं। इन कलाकारों के हिस्से में इन योजनाओं का कुछ सुख ही हाथ आ पाता है। मैं यह नहीं कहता कि विद्वानों के द्वारा लोक कलाओं पर शोध कार्य नहीं होना चाहिए, लेकिन साथ ही साथ इन लोक कलाकारों को प्रस्तुतियों की बारम्बारता और बेहतर मानदेय तो मिलना ही चाहिए।
बहरहाल इन लोक कलाकारों की आवाज बनने का बीड़ा  इण्डियन फोक आर्ट फेडरेशन ने उठाया है। इसका फैलाव बहुत कम समय में ही देश भर में हो चुका है और यह अपनी संगोष्ठियों व अन्य प्रस्तुतियों व आयोजनों के माध्यम से लोगों में इन कलाओं और कलाकारों के प्रति लोगों व सरकारों को जगाने का कम कर रहा है। फेडरेशन की मांगों में लोक कलाकारों की गणना, इन्हें राष्ट्रीय धरोहर घोषित करना, लोक कलाकारों के लिए वैकल्पिक आयवृद्धि योजना, स्वास्थ्य बीमा, 70 बरस से ऊपर के कलाकारों को पेंशन, कलाओ ंकी नियमित प्रस्तुतियों की व्यवस्था व उचित मानदेय की व्यवस्था करना शामिल है। फेडरेशन ने राष्ट्रीय लोक कला विकास व अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की मांग के साथ-साथ कई अन्य णांगें भी संस्कृति मंत्रालय से की हैं।
सच यही है कि लोक कलाएं पूरे समाज की होती हैं। समाज में रहने वाले समुदाय, जातीय समूह या परिवार इसके जन्म और विकास के लिए जिम्मेदार बनते हैं, लेकिन इन पर किसी का एक का अधिकार नहीं होता। जीवन के हर लमहों जुड़ी लोक कलाएं न केवल पीढिय़ों का मनोरंजन और ज्ञानवर्धन करती है, बल्कि कड़ी मेहनत के बाद राहत देने का काम भी करती हैं। लोक जीवन के अधिक निकट होने के कारण लोक कलाएं और इनके सभी प्रकारों के सम्बन्ध में समाज का हर सदस्य सहजता से जानता है और उसे अपना लेता है। यही नहीं वह अपनी परम्पराओं और जीवन शैली के अनुरूप थोड़ा बहुत परिवर्तन करके इन लोक कलाओं का सहभागी बन जाता है। ऐसा होने के कारण ही लोक कला में कलाकार और श्रोता या दर्शक का कोई अंतर होता ही नहींं। कलाकार ही श्रोता या दर्शक होता है और दर्शक या श्रोता ही कलाकार। यही वजह है कि लोक कलाओंंके बिना हमारा स्वयं का अस्तित्व भी अधूरा सा ही है। तो क्यों न हम सभी भी इसके लिए उठती आवाजों के सहभागी बनें।

गुरुवार, सितंबर 4

बेचारी बहस और बेमानी बहसिए

वे अपनी ही रौ में कहते जा रहे थे और उनके साथ शामिल लोग उनकी बात को काटने में लगे हुए थे। इन सब को एक साथ जूझते देख कुछ-कुछ चांव-चांव या कांव-कांव या फिर हुंआ-हुंआ का भाव आ रहा था। बहरहाल बीस मिनट बीत जाने के बावजूद भी पता नहीं चल पाया कि आखिर रार किस मुद्दे पर मची हुई है। दरअसल लाख आलोचनाओं के बावजूद समाचार चैनलों पर बहस के लंबे-लंबे उबाऊ कार्यक्रमों पर न तो रोक लग रही है और न ही उसके घिसे-पिटे फार्मेट में कोई बदलाव लाने की कोशिश हो रही है। यह कहना गलत न होगा कि बेतुकी और बे- सिर-पैर की बात करने वालों की बढ़ती फौज का फायदा उठाने में लगे समाचार चैनल महज समय बिताने के नाम पर ऐसे कार्यक्रमों की होड़ में शामिल हो चुके हैं। उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता कि उनका अपना हम-दम दर्शक इन बकवास मुद्दों (अधिकांशत:) पर होने वाली बेचारी बहसों और बेमानी बहसियों से ऊब सी गई है। कभी-कभी तो लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  इण्डस्ट्री ही एकमात्र ऐसी इण्डस्ट्री है, जिसे अपने उपभोक्ताओं की कोई परवाह नहीं है, वरना ब्रैण्डिंग और पैकेजिंग के इस समय में हर उद्योग अपने उपभोक्ता को सिर-माथे पर रखकर साथ निभाने के दबाव में नजर आ रहा है।
अब पिछले दिनों को ही लीजिए, पहले सरकारी सूत्रों के हवाले से यह खबर प्रसारित की गई कि केन्द्र सरकार पांच लोगों को भारत रत्न दिए जाने की तैयारी कर रही है। कई चैनलों ने उन नामों पर भी कयास लगा डाले जिन्हें भारत रत्न दिया जा सकता है या उनकी नजर में वे इसके हकदार हैं। नामों का चयन तमाम चैनलों में बैठे तथाकथित मीडिया अलम्बरदारों ने सत्ताधारी पार्टी लाइन के आधार पर तय कर दिए। कयासों पर सरकारी मुहर लगती कि इससे पहले ही उन नामों को बेमानी बहसिओं के हवाले कर दिया गया और फिर शुरू हो गया  चांव-चांव, कांव-कांव, हुंआ-हुंआ का दौर। हर कोई अपने-अपने हिसाब से भारत रत्नों की खोज कर रहा था और उन्हें बिना सोचे-समझे बहस में शामिल कर ले रहा था। किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि देश के जिन सपूतों को ये सब भारत रत्न देने की मांग के साथ अपनी बेचारगी से लथपथ बहस में शामिल कर रहे हैं, वे अपने देश की जनता के दिल और दिमाग में क्या जगह रखते हैं। चैनलों ने भी इन सपूतों के नामों को इन बेमानी बहसिओं की लपालप चलती बेमानी जुबानों पर आने देने में कोई बुराई नहीं समझी। बहस में भारत रत्न के हकदारों में हनी सिंह भी शामिल हो गया। अब आप इस दुर्गति को क्या कहेंगे।
एक चैनल को 'हिन्दी, हिन्दुस्तान और हिन्दूÓ का जुमला भा गया और उसने इस पर बहस करने के लिए आरोप-प्रत्योरोप में माहिरों को जुटाकर जो बहस कराई, वह किसी साम्प्रदायिकता फैलाने वाले कार्यक्रम की तरह ही लगी। जनाब एंकर महोदय लगातार अपने चहेते बेमानी बहसिओं को उकसाते नजर आए कि वे आपसे में तो भिड़ें ही साथ में ऐसा कुछ बोलें कि आम जनता भी आपस में भिड़ जाए। इसी तरह नेताओं के संसद से गायब रहने वाली बहस ने नेताओं को अपने दायित्वों को निभाने से वाकओवर सा दे दिया। इस बहस को देख-सुन कर ऐसा लग रहा था कि यह बहस संसद से गायब रहने का आरोप झेल रहे सांसदों की ओर से प्रायोजित की गयी हो। वैसे 'पेड न्यूजÓ और 'पेड व्यूजÓ का आरोप झेलने वाली मीडिया के लिए नया नहीं है। पहले भी कई बार इस तरह का आभास मिलता रहा है कि खबरिया चैनल प्रायोजित मुद्दे पर प्रायोजित बहसिओं को लेकर बेमानी बहस कराने में जुटे हैं।
बेचारे खबरिया चैनल। इन दिनों सुबह से ही इस बात में जुट जाते हैं कि आज शाम किन मुद्दों पर बहस हो सकती है और इन मुद्दों पर कौन लोग बात रख सकते हैं। हर चैनल के पास दो-तीन समाजशास्त्री, दो-तीन अर्थशास्त्री, दो-तीन विधि विशेषज्ञ और दो-तीन साहित्यकार टाइप के लोगों की फेरिस्त तैयार रहती है। राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं या फिर टेलीविजन बहसों में शामिल होने के लिए नामित नेताओं की फेहरिस्त भी पास में होती है। चैनलों में एक पूरी टीम होती है इन लोगों को आमंत्रित करने या फिर उन्हें बहस के दौरान कनेक्ट करने की। कई बार तो बहसिओं से राय-मश्विरा करके ही विषय का टयन होता है या फिर विषय को अंतिम रूप दिया जाता है। साथ ही इस बात की कोशिश की जाती है कि विषय ऐसा हो, जिसमें विषय से इतर जाकर आरोप-प्रत्यारोप लगाने और आंय-बांय शांय बकने की भरपूर गुंजाइश हो।
फिलहाल 'शर्म उन्हें आती नहींÓ कहकर ही काम चलाने वालों की बड़ी फौज होने के कारण बेचारी बहसों और बेमानी बहसिओं का दौर जारी है। ऐसी कोई नियामक संस्था ही नहीं है जो खबरिया चैनलों पर आयोजित या फिर प्रायोजित होने वाली इन बहसों में कहे जाने वाले 'वाक्योंÓ को स्वयं ही संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करे या फिर दिशा-निर्देश दे सके। हां, एक खबर कुछ भरोसा दिलाती है या फिर संशय में डालती है कि आने वाले दिन सुधार के हो सकते हैं या फिर मीडिया पर नकेल कसे जाने के हो सकते हैं। और खबर यह है कि देश के सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा है कि एफएम रेडियो पर रेडियो जॉकी किसी का मजाक नहीं उड़ा सकेंगे। उन्होंने इन रेडियो पर प्रसारित होने वाले कंटेंट पर भी निगरानी रखने की बात कही है। तय है कि जल्दी ही इन बहसों के लिए भी मानक बनाए जाएं। अगर ऐसा होता है तो यह खबरिया चैनलों के उपभोक्तोओं के लिए बेहतर खबर होगी।  

रविवार, अगस्त 17

बात कहने के बहाने और रास्ते


पिछले दिनों मैं एक स्टडी ग्रुप के साथ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की यात्रा पर था। मकसद था आदिवासियों की जीवन शैली के अनुरूप कम्युनिकेशन टूल्स की पहचान करना। यह ग्रुप ऐसे समय वहां पहुंचा था जब पूरा देश इस बहस का हिस्सा बना हुआ है कि आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में किस तरह लाया जाये। राइट टु इनफार्मेशन के इस समय में उन्हें उनके अधिकारों और उनके लिए उपलब्ध कानूनों व सरकारी योजनाओं की जानकारी से लैस कराने के लिए कौन सा कम्युनिकेशन टूल कारगर होगा, तलाश का मुख्य मुद्दा था। इसे लेकर ग्रुप के सभी सदस्यों के पास अपनी-अपनी सोच थी। लेकिन यह सभी जानते थे कि यह काम उतना आसान नहीं है, जितना समझा जा रहा है।
फिलहाल हम सभी मीडिया में खुद को माहिर समझने वाले लोग अपनी-अपनी सोच के साथ बस्तर में थे। एक ऐसे इलाके में जिसे वहां से बाहर रहने वाले लोग अत्यन्त पिछड़ा मानते हैं। हमारे सामने कला और सम्प्रेषण के तरीकों का इतना बड़ा जखीरा था कि सहसा हमें लगा कि हमारी पूरी यात्रा ही बेमानी है। मुझे यह कहने में कतई गुरेज नहीं कि कम्युनिकेशन के जितने कारगर टूल्स आदिवासी कहे जाने वाले लोगों के पास हैं, शायद उतने टेक्नोलाजी बेस्ड समाज के आधुनिक कहे जाने वाले लोगों के पास नहीं हैं। बड़ी बात यह कि उनके टूल्स एक साथ कई-कई मैसेज देने में सक्षम हैं और हर मैसेज की अपनी सार्थकता को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता।
मैं यहां अपने कुछ अनुभव शेयर करना चाहता हूं। सबसे पहले मैं बात करूंगा आदिवासी चित्रकार पेमा फात्या की। झाबुआ में रहने वाले इस चित्रकार से मैं कई वर्षों पहले भी मिला था। पिथौरा चित्रकला में माहिर इस बुजुर्ग चित्रकार की कृतियों में प्रकृति को बचाने से लेकर समाजिक सौहाद्र्र और साक्षरता के सहारे खुद के जीवन को बेहतर बनाने के संदेश मिल जाते हैं। रोचक बात यह कि यह सभी बातें अकृतियों और रंग संयोजन के माध्यम से कहा जाता है और बड़ी ही सहजता से समझ में भी आ जाता है। झाबुआ की दीवारों पर बने ये चित्र जितनी सरलता से भील जाति के लोग पढ़ लेते हैं शायद उतनी सरलता से उन्हें किसी आधुनिक आफसेट मशीन में छपे कलरफुल पोस्टर को पढ़ाने के लिए कफी मशक्कत करनी पड़े। हमने झाबुआ के आस-पास के इलाकों में दीवारों पर बने चित्रों को पढऩे की जितनी बार कोशिश की उतनी बार हर एक चित्र एक नया मैसेज देता हुआ मिला। बात कहने की सबसे पुरानी विधा इतनी सशक्त ढंग से हमारे सामने थी कि हम सभी चमत्कृत थे।
मैं अपनी इस यात्रा की एक और फाइन्डिंगस आपके साथ शेयर करता हूं। वह है वहां के लोगों का रेडियो प्रेम। अपनी भाषा और अपनी संस्कृति में रचे-बसे ये लोग आधुनिक कही जाने वाली दुनिया के लोगों के सरीखे ही हैं। इनमें से कुछ युवा इलाके के पास के शहरों में पढ़ाई करने या रोजी कमाने जाते रहते हैं। इनके पास मोबाइल भी हैं और छोटे-छोटे ट्रांजिस्टर रेडियो भी। ये हिन्दी फिल्मों के गाने सुनते हैं और आकाशवाणी से प्रसारित समाचार भी। वैसे रेडियो लगभग सभी के घर में है। मेरे लिये यह रोमांचित करने वाला अनुभव था कि आदिवासियों में रेडियो सुनते हुए अपने काम निपटाने की आदत सा बन गई है।
अब जरा इमेजिन कीजिये कि आप आदिवासी इलाके में हैं और रेडियो गीत-संगीत के साथ दीवारों पर मीनिंगफुल पिथौरा या फिर कोई अन्य फोक पेन्टिंग बनायी जा रही है। थोड़ी ही देर में यह तैयार भी हो जाती है। उधर से गुजरने वाला हर कोई थोड़ी देर के लिये ठहरता है और कुछ न कुछ गुनता-बुनता आगे बढ़ जाता है। कौन कहता है कि इस समाज में कम्युनिकेशन के टूल्स तलाशे जाने की जरूरत है? वास्तव में हर समाज चाहे वह अगड़ा हो या पिछड़ा, अपनी बात कहने के बहाने और रास्ते तलाश ही लेता है। .. .. और हमारी रिपोर्ट की सबसे अहम पंक्ति यही है।

शुक्रवार, अगस्त 15

निशाने पर आ गया पुराना साथी रेडियो


इधर केन्द्र सरकार ने रेडियो के अच्छे दिनों को लाने की कवायद शुरू की तो उधर बॉलीवुड में भी रेडियो दिखने लगा। पिछले दिनों सरकार ने एफएम पर समाचारों के प्रसारण को हरी झंडी दी तो लगा कि अब रेडियो एक बार फिर अपने पुराने रिश्तों को जल्दी ही बहाल कर लेगा। अभी कुछ बात आगे बढ़ पाती की बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्ट कहे जाने वाले अभिनेता आमिर खान अपनी नई फिल्म के पोस्टर में बिना कपड़ों के रेडियो के सहारे अपने को अश्लील कहे जाने से बचाते हुए नजर आ गए। सरकार और बॉलीवुड के इस अंदाज ने रेडियो के प्रशंसकों में नई तरह की बहस छेड़ दी है कि आने वाले दिनों में आखिर रेडियो क्या-क्या गुल खिलाएगा।
बहरहाल मोदी सरकार ने किसी के अच्छे दिन लाए हों या नहीं, लेकिन इतना तय है कि जन माध्यमों में सर्वाधिक मजबूत रेडियो के अच्छे दिन जरूर आने वाले हैं। बहुत इंतजार के बाद अब एफ एम रेडियो पर समाचार प्रसारित करने की मांग पूरी होने जा रही है। पिछले दिनों सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में बताया कि एफएम रेडियो  के तीसरे चरण के अंतर्गत मंजूर दिशा निर्देशों के तहत निजी एफएम रेडियो पर प्रसार भारती के साथ आपसी सहमति के आधार पर ऑल इण्डिया रेडियो का समाचार फरसारित करने की मंजूरी दे दी गई है। श्री जावड़ेकर ने यह भी कहा कि एफएण रेडियो स्थानीय स्तर खेल कार्यक्रमों, यातायात और मौसम सम्बन्धित बुलेटिन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, परीक्षा व दाखिले की जानकारी, रोजगार के अवसरों की जानकारी, बिजली व जलापूर्ति तथा स्वास्थ्य सम्बन्धित जानकारियां या एलर्ट जैसी गैर समाचार सामाग्री सहजता से प्रसारित कर सकते हैं। बहरहाल सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि निजी एफएम रेडियो चैनल अपने समाचारों के लिए पीटीआई समाचार एजेंसी को भी स्रोत के रूप में अपना सकते हैं। एक महत्वपूर्ण निर्णय सरकार ने यह भी लिया है कि अब एफएम रेडियो के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 26 प्रतिशत कर दिया है। वादा तो यह भी है कि इन निर्णयों के परिणाम देखने के लिए सतत समीक्षा भी की जाती रहेगी। जाहिर है कि सरकार ने रेडियो की दुनिया को नया जीवन देने की पहल कर दी है।

यह तो तय था कि हमारे पास एक बार फिर रेडियो लौट रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच मोबाइल फोन की बढ़ती पहुंच ने एफएम रेडियो को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश के जिन बड़े शहरों में एफएम के निजी चैनलों को लोगों तक पहुंचने का मौका दिया गया, उनके अनुभव उत्साहवर्धक रहे हैं। सरकार और बाजार, दोनों एफएम की बढ़ती लोकप्रियता से उत्साह में हैं। विज्ञापन बाजार भी अपने फायदे की तलाश में लग गया है। वास्तव में रेडियो एक ऐसा माध्यम आज भी बना हुआ है जो समाचारों और मनोरंजन के लिए लोगों के करीब है। ग्रामीण भारत ही नहीं इस माध्यम की शहरी युवाओं पर भी बहुत व्यापक पकड़ है। युावओं को केन्द्र में रखकर नीतियां तय करने वाले हुक्मरान को इस माध्यम की व्यापक स्वीकृति को नकारने की हिम्मत जुटा पाना नामुमकिन है। बाजार और सत्ता, दोनों ही इसमें अपने-अपने हिस्से के मुनाफे को देख रहे हैं।
बहरहाल बाजार के मानिंद जहां अधिक से अधिक एफएम रेडियो के लाइसेंस प्राप्त करने के जुगाड़ में लग गए हैं, वहीं सरकार भी बहुत दिनों तक जनसंचार के इस सर्व-सुलभ मीडियम की अनदेखी नहीं करना चाहती। इण्डस्ट्री से जुड़े लोग कास्टिंग के इस सिस्टम के फिर से तेजी पकडऩे को लेकर उत्साह में हैं। आने वाले दिनों में अगर सबकुछ ठीक-ठाक ढंग से चलता रहा तो यह तय है कि देश के हर जिले में दो से तीन एफएम रेडियो चैनल होंगे और उनके बीच जमकर प्रतिस्पर्धा रहेगी। यह प्रतिस्पर्धा जहां अधिक से अधिक श्रोताआो को पाने की होगी, वहीं विज्ञापन बटोर लेने की भी होगी। इससे कहां इंकार किया जा सकता है कि जब पूंजी का निवेश होगा तो मुनाफे की होड़ तो मचेगी ही। यह भी तय है कि मुनाफे और पूंजी के बीच मचने वाले घमासान में कंटेंट प्रभावित होकर रहेगा।  
फिलहाल मीडिया इंडस्ट्री में रेडियो की वापसी और उसके तेजी से व्यापक हो जाने की धमक भर से एक डर सभी को सताने लगा है कि निजी एफएम रेडियो के कंटेंट पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो इसको लेकर भी टेलीविजन और सोशल मीडिया के कंटेंट को लेकर मचने वाले बवाल की तरह ही मीडिया इंडस्ट्री और सरकारी तंत्र के बीच समस्याएं खड़ी होने में देर नहीं लगेंगी।
पिछले दिनों यह बात सामने आई थी कि सरकार 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत एफएम रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली सामाग्रियों की निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है। वास्तव में सरकार ने इस योजना अवधि में देश में 800 निजी एफएम रेडियो चैनल प्रारम्भ करने का मन बनाया हुआ है, जिसकी धमक नई सरकार के आने के बाद तेजी से सुनाई देने लगी है। यह भी तय ही है कि आने वाले दिनों में ये निजी एफएम रेडियो समाचार प्रसारण का विस्तृत अधिकार पा जाएंगे। ऐसे में यह बहुत जरूरी हो जाता है कि इनसे प्रसारित होने वाले कंटेंट को किसी निगरानी तंत्र से गुजारकर ही लोगों तक पहुंचाया जाए। पिछले दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया मानिटरिंग सेंटर के एक कार्यक्रम में भारत सरकार के सूचना एंव प्रसारण सचिव ने इस बाबत जानकारी देते हुए यह चिंता जताई थी कि अभी तक रेडियो पर प्रासारित होने वाली सामाग्रियों की अर्थपूर्ण ढंग से निगरानी नहीं की जा सकी है, लेकिन इस तरह के प्रभावी तंत्र को विकसित किये जाने की जरूरत है। उस कार्यक्रम में मौजूद हर मीडिया विशेषज्ञ ने इस बात पर सहमति जताई थी।
पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया और फिर सोशल मीडिया के कंटेंट को लेकर हो चुके विवादों के मद्देनजर इस तरह की पहल बहुत जरूरी होगी। वैसे भी अभी तक जो एफएम रेडियो बाजार में हैं, उनके कंटेंट, भाषा और प्रेजेंटेशन को लेकर पहले भी प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं। दूसरी ओर मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों में से अधिकांश ने इस मीडियम को अपने सिलेबस में शामिल ही नहीं किया और अगर किया भी तो प्रायोगिक पक्ष गायब ही रहा। ऐसे में बाजार में एकाएक आने वाले एफएम रेडियो के चैनलों पर कैसे लोग और कब तक काम करेंगे, इस प्रश्न पर भी गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है।