सोमवार, फ़रवरी 16

...और अब ‘मोबाइल’ पर निबंध व साहित्य का जमाना


आज से पैंतीस साल पहले जब मैं दसवीं क्लास का छात्र था तो मुझे ‘मेरा प्रिय अखबार’ पर निबन्ध लिखने को दिया गया था और मुझे याद है कि मैंने अपने अखबार की ढेर सारी खूबियां गिना डालीं थीं। मसलन मेरा अखबार देश-दुनिया की खबरें देता है, नॉलेज बढ़ाता है, नई-नई इनफॉर्मेशन देता है, नई फिल्मों के बारे में बताता है, साहित्य पढ़ाता है, घूमने की जगहों से परिचित कराता है,  बेरोजगारों को नौकरी पाने की राह बताता है, कुंवारों की जोड़ी बनाने में हेल्प करता है आदि-आदि। तीस साल बाद मेरे बेटे के स्कूल में ‘माय डियर मोबाइल’ पर निबंध लिखने को मिला है और मेरे लिए यह आश्चर्य से कम नहीं कि वह मोबाइल की लगभग वैसी ही खूबियां गिना रहा है, जैसी मैंने अपने अखबार की गिनायीं थीं। बड़ी बात यह कि न मैं तब गलत था और न वह अब।
मेरे बेटे ने कुछ इस तरह मोबाइल की खूबियां गिनायीं। ‘माय डियर मोबाइल’ देश-दुनिया की खबरें देता है, नई-नई इनफॉर्मेशन देता है और पलक झपकते उन्हें अपडेट कर देता है, नई फिल्मों के बारे में ही नहीं बताता, बल्कि उन्हें दिखाता भी है, पापा को शेयर बाजार से जोड़े रखता है, क्रिकेट के स्कोर से अपडेट करता है, बेरोजगारों को नौकरी पाने की राह ही नहीं बताता, उन्हें नौकरी दिलाता भी है, कुंवारों की जोड़ी बनाने में हेल्प भी करता है। रेल और प्लेन के सम्बन्ध में इनफॉर्मेशन देता है। हमारा भविष्य बांचता है और हमें बेहतर लाइफ स्टाइल के टिप्स देता है। बड़ी बात यह कि माय डियर मोबाइल रेडियो, टेलीविजन के साथ-साथ अखबार की तरह भी हमारे साथ रहता है। उससे भी बड़ी बात यह कि इसने हमारे रिश्तदारों और दोस्तों के बीच होने वाली चिट्ठी-पत्री की जगह ले ली है। माय डियर मोबाइल कैमरे की तरह काम करता है और हमसेे सिटीजन जर्नलिस्ट की तरह काम भी करा लेता है। माय डियर मोबाइल मुझे इंटरनेट से भी जोड़ देता है। आदि-आदि।
‘माय डियर मोबाइल’ में मुझे यह भी पढऩे को मिला कि मंहगी और मंहगी होती दुनिया में एक पैसे की बात कहीं हो रही है तो वह मोबाइल की ही दुनिया है। मजेदार बात यह कि जब हम एक पैसे के मायने और अहमियत भूल चुके थे तब मोबाइल ने हमें उससे जोड़ दिया है। एक पैसे में एक सेकण्ड बात का फण्डा कारगर हुआ है और एक नये पैसे की याद ताजा हो उठी है। काश! वह एक नये पैसे का सिक्का अपने पास होता और मैं ‘माय डियर मोबाइल’ निबंध में इस फण्डे का जिक्र कर रहे अपने बेटे को वह दिखा पाता। फिलहाल मोबाइल ने अनायास ही मेरे बेटे और उसकी पीढ़ी के साथ-साथ आगे-पीछे की कई पीढिय़ों को एक-एक पैसे की अहमियत जता दी है। रूपयों के हिसाब के प्रति गैर-जिम्मेदार ये पीढिय़ां कम से कम एक-एक पैसे के प्रति जिम्मदार होती नजर तो आने लगी हैं।
चलते-चलते एक खबर यह भी कि अखबारों की तरह ही मोबाइल पर भी साहित्य की धमक सुनाई देने लगी है। मेरे एक मित्र आजकल अपनी कविताएं मोबाइल पर लिख रहे हैं और उन्हें लगातार अपने मित्र मंडली को मैसेज के जरिए भेज भी दे रहे हैं। पिछले दिनों एक महाशय ने पूरी महाभारत की कहानी ट्विटर के जरिए कह डाली। एक सज्जन मोबाइल पर उपन्यास लिख रहे हैं तो एक ने लघु कथाएं लिखना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि आने वाले दिनों में मोबाइल साहित्य विमर्श के जानकार और आलोचकों की जरूरत पड़ सकती है। तैयार रहिए।

रविवार, फ़रवरी 15

...तो फिर क्यों न याद रखें हम लक्ष्मीकांत वर्मा को


आज पन्द्रह फरवरी को लक्ष्मीकांत वर्मा का  जन्मदिन है। यूं तो उन्हें रंगकर्म की कई संस्थाएं याद करती रहती हैं, लेकिन किसी साहित्यिक संस्था या संगठन द्वारा उनकी याद में कोई कार्यक्रम न करना खलता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक पीढ़ी ऐसी है इस शहर में जो उन्हें बहुत ही शिद्दत के साथ याद रखती है। अभी इस शहर में उनके साथ साहित्यिक संगोष्ठियों में मौजूद रहने वाले भी कई हैं जो उनकी यादों को बहुत करीने से सहेजे होंगे। कारण केवल इतना कि उनके जैसा सहज और सरल व्यक्तित्व साहित्य में जल्दी नहीं मिलता।

मुझे याद है कि जिन दिनों मैं साहित्यिक खबरें खोजता इस शहर में फिरा करता था, उन दिनों लक्ष्मीकांत हम जैसे कई पत्रकारों के सबसे बड़े पैरोकार हुआ करते थे। वे न केवल साहित्य की राजनीति की दीक्षा दिया करते थे, बल्कि अपने उदाहरणों से हमें अपने समय से जूझने का सलीका  भी सिखाया करते थे।  वास्तव में तमाम उठापटकों और सामाजिक-साहित्यिक बवंडरों के बीच के बीच अपनी ठसक बनाकर लगातार सक्रिय रहना, केवल और केवल लक्ष्मीकांत के ही वश में था। वे एक साथ कई-कई पीढिय़ों में सक्रिय और लोकप्रिय थे। मुझे याद है कि वे शहर में होने वाले सभी सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों में पहुंचने की कोशिश करते और हर नए रचनाकार का हौसला बढ़ाने में लगे रहते।
पेश से पत्रकार रह चुके लक्ष्मीकांत वर्मा सामाजित घटनाओं के प्रति जितनी सजगता रखते थे, उतनी ही राजनीतिक सतर्कता भी उनमें दिखती थी। लेकिन, मजाल है कि लाभ के लिए वे अपनी साख और मान्यताओं से किसी तरह का समझौता कर लें। वे जिस शिद्दत के साथ पत्रकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों के प्रति चिंतित रहते थे, मैंने अन्य किसी साहित्यकार को चिंतित होते नहीं देखा। वे केवल चिंता जता कर इतिश्री कर लेने वालों में से नहीं थे। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने तत्कालीन प्रदेश सरकार को पत्रकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों की बेहतरी के लिए नीतियां बनाने और उन्हें अमल में लाने के लिए बकायदा एक मसौदा तैयार करके दिया था। यदि उस मसौदे पर अमल हुआ होता तो तस्वीर का रुख और ही होता।
लक्ष्मीकांत वर्मा ने अपने पीछे की पीढिय़ों को अपनी बात बेबाकी से रखना तो सिखाया ही, साथ ही उस पर इमानदारी के साथ डटे रहना भी सिखाया। मुझे यह बात कई बार दुहराने में कोई गुरेज नहीं है कि हमारे समय की कई पीढिय़ों की बनावट और मंजावट में लक्ष्मीकांत वर्मा का बहुत बड़ा योगदान था। अपने समय को समझना और फिर उस अपने समाज के बने-बनाए खांचे में इस तरह फिट कर देना कि हर किसी को वही सच लगने लगे, यह उन्हें बखूबी आता था। उनके कविता संग्रह ‘रू-ब-रू लक्ष्मीकांत’ में इस बात को सच होते देखा जा सकता है। तो फिर क्यों न याद रखें हम लक्ष्मीकांत वर्मा को। उनकी स्म़तियों को सहेजते हुए उन्हें उनके जन्मदिन पर नमन।

रविवार, फ़रवरी 1

...आखिर कैसे बचे जल जमीन और जीवन




बदलते समय और बदलती दुनिया ने हमें जिस मोड़ पर लाकर खड़ा किया है, वहां से जल, जमीन और जीवन को बचाने का रास्ता कठिन सा दिखने लगा है। यह अनायास नहीं है कि केन्द्र सरकार के जल संसधन मंत्री को बीते वर्ष जल सप्ताहको प्रारम्भ करते वक्त यह कहना पड़ा था कि भारत पहले से ही जल की कमी के दबाव को झेल रहा है और आने वाला समय हमें जल दुर्लभता वाले देश में तब्दील कर देगा।समस्या नई नहीं है। सन 2002 में ही सुप्रीम कोर्ट ने देश में सूखा और बाढ़ सरीखी जल जनित प्राकृतिक आपदाओं और सरकारी नीतियों के बीच बिगड़ते  रिश्तों का संज्ञान लेते हुए भारत सरकार को निर्देश दिया था कि एक दशक के अंदर ही देश की प्रमुख नदियों को जोडऩे के लिए आवश्यक कदम उठाए जायें। लेकिन, तमाम कवायदों के बाद भी हम रहे वही ढाक के तीन पात ही।

सच तो यह है कि किसी लोकतांत्रिक देश में यदि नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं और अधिकारों के लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े तो इसके मायने तो यही हैं कि पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। आज पानी से जुड़े सरकारी और गैर सरकारी आंकड़े भी कठिन समय की गवाही दे रहे हैं। विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि आने वाले समय में बढ़ती जनसंख्या और पानी की खपत के बीच रिश्ते और खराब होते जाएंगे। दूसरी तरफ बाजार की पानी को लेकर बढ़ती संवेदनशीलतादिनोंदिन बढ़ती जा रही है और पानी को लेकर होने वाली निपनिया राजनीति पानी पर कब्जा करने और उसे सोख जाने के लिए आतुर है।
ऐसे में यह प्रश्न चिंता तो देता ही है कि किस तरह हम अपने जल, जमीन और जीवन को बचा ले पाएं। न केवल बचा लें, बल्कि उसे भविष्य की पीढिय़ों के लिए सुरक्षित सहेज भी लें। अब यह जरूरी लगने लगा है कि जल्दी ही सरहदों के आर-पार पानी-सहयोग-संधिपर बात होनी चाहिए और उसे मूर्त रूप देने में देर नहीं करनी चाहिए। भले ही ये सरहदें अपने प्रदेशों के बीच की हों या फिर पड़ोसी देशों के बीच हों। वास्तव में हमारा यह समय वाटर फ्रेंडशिपको बढ़ावा देने और उसे लगातार मजबूत करने का है। दूसरी कवायद जन जागरूकता लाकर ऐसे सामाजिक दबाव समूहबनाने की है, जो नित नए पैदा हो रहे जल अधिपतियोंके खिलाफ नागरिक नाकेबंदीकरके उनकी दबंगई को खारिज कर दें। सही मायनों में तभी हम जल, जमीन और जीवन को बाजार के कब्जे में जाने से भी रोक पाएंगे।
कुछ अहम प्रयास सरकार की ओर से किये जाने भी जरूरी हैं। वास्तव में पानी के स्रोतों के सूखने, नष्ट होने या फिर नए स्रोतों की खोज और निर्माण न होने का कारण सरकारों की ओर से बरती जा रही लापरवाही का ही नतीजा हैं। सरकार के पास जल नीति तो है, लेकिन पानी के बेजा इस्तेमाल, अवैध दोहन, खपत की बढ़ती रफ्तार पर कमान कसने के लिए कोई प्रभावी कानून नहीं हैं। लिहाजा हमारे जीवन का आधार कहे जाने वाला पानी अराजकता का शिकार हो गया है। सरकारों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि किस तरह लोगों को जोडक़र पानी के स्रोतों को बचाने और उन्हें समृद्ध करने के प्रयास जारी रहें। वैसे केन्द्र सरकार ने  2012 की नेशनल वाटर पॉलिसी में एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धनकी बात कही है, लेकिन यह बिना जन जागरूकता और जन सहभागिता के असंभव ही है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी यह नहीं जानता कि जिस पानी को वह बेकार बह जाने दे रहा है, वह उसके जीवन का पर्याय है। उसका भोजन, उसका स्वास्थ्य, उसका परिवेश, उसका पर्यावरण .. .. ..सब कुछ बिना पानी के क्षण भर भी ठहर नहीं सकता।   


मंगलवार, जनवरी 27

जो दिलों में रहते हों, उन्हें स्मारकों की जरूरत नहीं


निराला सम्मान लेने के बाद प्रख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल ने कहा कि हिन्दी के साहित्यकारों को वह सम्मान नहीं मिलता जो अन्य भाषाओं के साहित्यकारों को मिलता है। खासकर हमारी सरकारें हमें उस तरह नहीं लेतीं, जैसे कि अन्य भारतीय भाषाओं के प्रदेशों की सरकारें अपने साहित्यकारों को लेती हैं। उन्होंने बांग्ला और तमिल भाषा के साहित्यकारों के साथ रूस के साहित्यकारों के सम्मान में होने वाली गतिविधियों का जिक्र किया और समारोह में उपस्थित लोगों का आह्वान किया कि वे केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार को चिट्ठियां लिखकर यह मांग करें कि नई बनने वाली कालोनियों, हवाई अड्डों और सडक़ों के नाम हमारे साहित्यकारों के नाम पर करें, ताकि लोग अपने साहित्यकारों को करीब से महसूस कर सकें।
क्या आप समझते हैं कि ऐसा किया जाना जरूरी है? मेरी समझ में इस तरह की कोई भी पहल बेमानी ही साबित होगी। अव्वल तो हिन्दी के साहित्यकार अपने पाठकों से दूर हैं, ऐसा गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता। सच यह है कि अन्य भारतीय भाषाओं में बड़े साहित्यकारों की संख्या बहुत कम होती है। लिहाजा जब उनके लिए कोई कार्यक्रम होता है तो बहुत बढ़-चढक़र लोग भाग लेते हैं और यह अहसास होता है कि वे अपने साहित्यकारों को बहुत सम्मान दे रहे हैं। बरक्स इसके हिन्दी में बड़े साहित्यकारों की लम्बी-चौड़ी फेहरिस्त है। हिन्दी साहित्य की लगातार बनी रहने वाली सक्रियता भी नित ने बड़े साहित्यकारों का नाम इस फेहरिस्त में जोड़ती रहती है।
दूसरी बात यह कि इतनी बड़ी संख्या में साहित्यकारों का होना विचारों की टकराहट का कारण बना रहता है। यही वजह है कि पूरा हिन्दी साहित्य वादों और विवादों में बंटा हुआ है। अब बेचारा हिन्दी का पाठक, किसी वाद-विवाद का हिस्सा बने अगर किसी साहित्यकार को चाहना भी चाहे तो वह ऐसा नहीं कर सकता। वह इसलिए कि हमारे यहां इस तरह का कोई प्रयास नहीं होता कि लोगों को सीधे अपने लेखक से संवाद का मौका मिल सके। बड़े-बड़े स्वनामधन्य लेखकीय संगठन महज बयानिया टाइप के संगठन बन कर रह जा रहे हैं। कभी-कभी तो उनकी चुप्पी पर गुस्सा भी आता है, लेकिन कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर कुछ कहा तो वे तत्काल से आपको अपना विरोधी घोषित कर देंगे।
जब साहित्य समाज आती जाती सरकारों में अपने लिए ‘स्पेस’ तलाशता है तो वह जनता का नहीं रह जाता। कुछ लोग ही उसके साथ होते हैं और वह भी पार्टी लाइन पर सोच और समझ रखने वाले। मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैं जब पुरनिया संगठनियों ने अपने-अपने संगठन महज इसलिए छोड़ दिए कि वे जनता से कटे-कटे से रहते हैं। अब चाहे वह नरेश मेहता हों या फिर अमरकांत और चाहे कोई अन्य। सभी ने यह माना कि वादों में बंटकर साहित्य और साहित्यकारों का अहित ही हुआ है। क्षत्रप बनने की ख्वाइश पाले कुछ लोगों ने स्थिति को और भी बिगाडक़र रखा हुआ है।
फिलहाल चित्रा जी की अपील पर कितना अमल होता है यह तो भविष्य ही बताएगा। मुझे जहां तक याद है कि इस शहर में महाप्राण निराला को जनता का सम्मान भी मिलता रहता है। दारागंज में बसंत पंचमी के दिन उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाने की होड़ सी लगी रहती है या फिर आज भी होली के दिन लोग महादेवी के निवास पर पहुंचना नहीं भूलते। इलाहाबाद में साहित्यिक ठीहे किसी की कोशिश के मोहताज नहीं होते वे खुद-ब-खुद गुलजार हो जाया करते हैं। इलाहाबादी ठसक शायद ही चित्रा जी की अपील पर अमल कर सके। शायद मैं गलत साबित हो जाऊं। शायद...। कुछ भी हो सकता है। क्या होगा? यह आने वाला समय बताएगा।

रविवार, जनवरी 25


यह कुकुर पुराण मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित 2006 के कला मेला में सुनाया था। 

सैंया भये कोतवाल तो.. ..


‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा’ इसी के साथ शुरू होता था बच्चों का एक खेल जिसमें हम ही चोर थे और हम ही पुलिस। भले ही चोर-पुलिस का यह खेल अब की पीढ़ी के खाते से बाहर हो गया हो, लेकिन अपने शहर में ऊंचे स्तर पर चोर-पुलिस का खेल चालू है। ठीक उसी पुरनिया पड़ गये खेल की तर्ज पर चोर-पुलिस एक ही घर या मोहल्ले के निकल रहे हैं और ठीक-ठीक उसी तरह खेल रहे हैं। अब जरा इमेजिन कीजिये कि पुलिस के घर पुलिस पहुंचे और चोर को पकड़ ले, चोर पुलिस वाले का बेटा या भाई निकले.. .. क्या सीन है भाई, एकदम फिल्मी।
अब देखिए न, पिछले दिनों एक ही घर और मोहल्ले से पुलिस और चोर दोनों के साथ-साथ  के होने की खबर मिली। इस खबर ने एक प्रसिद्ध कहावत को तो चरितार्थ होने का मौका भी उपलब्ध करा दिया। चरितार्थ होने का सुख पाने वाली कहावत यह कि जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। अब सैंया न सही लेकिन पिता और भाई पुलिस में हों तो चोरी-छिनैती का सुख उठाने में काहे का डर। हां, यह बात भी दीगर है कि पुलिस वाले रिश्तेदार हों तो जेल की हवा खाने का भी अपना अलग ही मजा है। अब जब पुलिस के घर में चोर रह सकते हैं तो पुलिस को सैंया मान लेने की कवायद में पुलिस लाइन में रहने वाले कहां पीछे रह सकते हैं।  इस तर्क को साबित किया पुलिस लाइन में रहने वाले एक चेन स्नेचर ने।
वैसे अपने शहर में चोरों की वैराइटीज में लगातार इजाफा होता जा रहा है। पिछले दिनों जब एटीएम चोर की नई वैराइटी सामने आयी थी तो कई लोग चौंक गये थे। इस बार ट्रैक्टर चोर की वैराइटी मिली है। इस वैराइटी ने जिस तरह टवेरा और ट्रैक्टर की जुगलबंदी का सच उगला है, वह चौंकाने वाला तो है ही साथ ही चोरी के क्षेत्र में हो रहे इनोवेटिव प्रयोगों की पोल भी खोलता है। .. ..कौन कहता है कि इस सदी के अगले इनोवेटिव आइडियाज वाले दशक में हम पीछे रहेंगे। हां इसके लिए शहर हो तो मेरे शहर जैसा, जहां के चोर भी हमेशा नया-नया सृजन करने में लगे रहते हैं।    

रविवार, जनवरी 18

अब नहीं रहे वे साहित्यिक अड्डे


इलाहाबाद और अड्डेबाजी। कोई जोड़ नहीं है इस जुगलबंदी का। तरह-तरह के अड्डे और तरह-तरह के अड्डेबाज। बचपन में अहियापुर की चबूतरेबाजी देखा करता था। लाजवाब हुआ करता था मोहल्ले के हर घर के बाहर बने चबूतरे पर होने वाला विमर्श। तब लगता था कि यह महज समय काटने का जरिया है। टेलीविजन तो था नहीं, रेडियो पर धीमे-धीमे गाने बजा करते थे और निर्धारित समय पर समाचार को तेज आवाज में सुना जाता था और फिर उस पर ‘सामाजिक विमर्श’ हुआ करता था। हर किसी का अंदाज निराला था। हर कोई ‘गुरू’ था और हर ‘गुरू’ के पास अपने-अपने सिद्धांत। बता दीजिए दुनिया का कोई और शहर, जहां इतनी शिद्दत से तमाम गुरू एक साथ बैठकर देश-दुनिया की किसी सम्स्या पर विमर्श करते हों।  
बड़ा हुआ तो साहित्यिक अड्डेबाजी का सुख उठाने को मिलने लगा। यह पिछली सदी के अंतिम दो दशकों की बात है। शहर में कई-कई साहित्यिक अड्डे थे। काफी हाउस, एजी ऑफिस के बाहर, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, संग्रहालय, हिन्दी साहित्य सम्मेलन और लोकभारती। मुझे याद है कि उन दिनों हमें किसी साहित्यकार को खोजना होता था तो हम दोपहर से पहले कॉफी हाउस या लोकभारती और दोपहर बाद एजी ऑफिस के बाहर पहुंच जाया करते थे। कॉफी हाउस के भीतर एक टेबल को घेरकर बैठे रामस्वरूप चतुर्वेदी, जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामकमल राय, सत्यप्रकाश मिश्र, मार्कण्डेय, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया गप लड़ाते मिलते तो एजी के बाहर उमाकांत मालवीय, सरनबली श्रीवास्तव, नौबत राय पथिक, अमरनाथ श्रीवास्तव समेत कई लोग। उन दिनों हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद संग्रहालय और  हिन्दी साहित्य सम्मेलन की संगोष्ठियां यादगार हुआ करती थीं। हमारी पीढ़ी ने इन गोष्ठियों में अपने समय के तमाम साहित्यकारों के साथ महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, इलाचन्द जोशी, नरेश मेहता, अमरकांत, रघुवंश को यहीं कई-कई बार सुना और बोलना-रचना सीखा।
वास्तव में ये अड्डे ही हमारी पीढ़ी के तमाम लेखकों के लिए सृजन की पाठशाला हुआ करते थे। हमने साहित्य के कई फलसफे इन्हीं अड्डों पर बैठकर सीखे। बड़ी बात यह थी कि इन साहित्यिक अड्डों पर उपस्थित हर रचनाकार अपने पीछे आने वाली पीढ़ी की बनावट और मंजावट की जिम्मेदारी बखूबी निभाता था। यही वजह है कि हम इन अड्डों को किसी तीर्थ की तरह देखा करते थे। आज जब इन अड्डों की ज्यादा जरूरत है तो ये नहीं हैं। और, अगर हैं भी तो वैसे नहीं रहे जैसे पहले हुआ करते थे। काश वे दिन लौटाए जा सकते।