सोमवार, फ़रवरी 17

बड़ी कठिन है डगर पनघट की...

जनवादी लेखक संघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने एलान किया कि वे अपनी लेखक बिरादरी को एक साथ काम करते देखना चाहते हैं। उन्होंने लेखक बिरादरी के तमाम संगठनों खासकर प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच को साथ लेकर उन ताकतों का सामना करने की बात कही है, जो गाहे-ब-गाहे हमारी सामाजिक संचेतनाओं को चुनौती देती रहती हैं। दूधनाथ सिंह ने यह भी कहा है कि वे बरास्ते जनवादी लेखक संघ, रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रजातांत्रिक शक्तियों को मजबूत करने का भी काम करेंगे। हम सब की शुभकामनाएं और बिना शर्त सहयोग उनके साथ होना चाहिए।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह सब क्या इतना आसान है? सच यह है कि लेखकों के बीच बिरादरीवाद इतनी गहराई तक है कि पूछिए ही नहीं। एक संगठन के कार्यक्रम में स्थानीय स्तर पर अपने-अपने संगठन से बाहर निकलकर भागीदारी निभाने वाले तो मिल जाएंगे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होते देख पाना दूर का सपना ही है। लेखकीय संगठनों का एक और रवैया है कि वे पूरी लेखकीय बिरादरी को अपने साथ लेकर चलना ही नहीं चाहते। कोई लेखक अगर उनके संगठन का सदस्य नहीं है या फिर उनकी विचारधारा से अभिप्रेरित किसी अन्य संगठन का भी सदस्य नहीं है तो उनके किसी काम का नहीं होता। वे न तो उसे अपने साथ बैठाना पसंद करते हैं और न ही अपने आयोजनों में भागीदारी का मौका ही देते हैं। जो उनके द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा के भीतर आ गया वही अच्छा लेखक है, बाकी सब नाकारा। मजेदार बात यह कि लेखकीय संगठन के लोग किसी नए लेखक की पीठ तभी ठोंकने को तैयार होते हैं, जब तक वह उनके खेमे में बतौर सदस्य नहीं आ जाता। ये लोग खेमे के बाहर के लेखक की रचना पर चर्चा तक करने से गुरेज करते हैं।
पुराने दिनों की स्वस्थ्य परम्पराएं गायब हैं। जब संगठनों के बीच रचनात्मकता को आगे लाने और उससे जुड़े रहने की होड़ लगी रहती थी और लिखने वाले का सम्मान होता था। कोशिश होती थी कि हर अच्छा रचनाकार उनके संगठन में आ जाए। अब उखाड़-पछाड़ और स्वीकार-नकार की होड़ में शामिल लोग लिख कम रहे हैं, बयान ज्यादा दे रहे हैं। ‘ले दही-दे दही’ जुमले के अनुयायी एक दूसरे की पीठ थपथपाकर इतिश्री कर ले रहे हैं। लेखकीय संगठनों में क्रीमी लेयर और उसके नीचे के लोग साफ तौर पर अलग-अलग दिखाई देते हैं। क्रीमी लेयर में शामिल लोग तमाम हो-हल्लों से दूरी बनाकर चलने में ही ठीक समझते हैं। यही वजह है कि स्थिति उतनी बेहतर नहीं है, जितनी होनी चाहिए।
लिहाजा यह तय है कि दूधनाथ जी को अपने एलान को अमली जामा पहनाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। दूधनाथ जी के पास यह क्षमता तो है ही कि वे इन तमाम दुरूहताओं से निपटकर लेखकीय संगठनों के इतिहास में कुछ नए पृष्ठ जोड़ सकें। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिन हमें लेखकीय संगठनों को बेमानी लफ्फाजी से मुक्त होते और रचनात्मकता से जुड़ते और उसका सम्मान करते दिखाएंगे। अगर ऐसा होता है तो सच में हम सब रचनात्मकता के नए अध्याय लिखे जाते देखेंगे और प्रजतांत्रिक मूल्यों को मजबूत होते हुए भी। आमीन......।    




   


......वे जो  हमेशा अपने समय का सच रचते रहे 

कथाकार अमरकांत से धनंजय चोपड़ा की बातचीत 
वे अपने समय को बखूबी जीते थे, उसमें रम जाते थे, उसकी मिठास, कड़ुवाहट, उठा-पटक, उहापोह और जीवन संघर्ष का अनुभव लेते थे और फिर डिप्टी कलक्टरी, जिन्दगी और जोंक, बस्ती, हत्यारे, मौत के नगर, दोपहर का भोजन, सुन्नर पाण्डे की पतोहू, आंधी, इन्हीं हथियारों से जैसी सैकड़ों कालजयी कृतियां रच डालते थे। वे अपने जीवन संघर्षों से जूझते हुए मिलते थे, लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं आती थी। वे जोश के साथ मुलाकात करते थे और लोगों को आत्मविश्वास भेंट कर देते थे। वे उम्र के कई अस्सी पड़ाव पार कर चुके थे, लेकिन किसी युवा रचनाकार से अधिक रचनाकर्म करते थे। यह सिर्फ इसलिए कि वे अमरकांत थे। वरिष्ठï कथाकार-पत्रकार अमरकांत!
प्रेमचन्द के बाद अगर किसी कहानीकार पर निगाह ठहराने का मन करता है तो वे अमरकांत हैं। आजादी की लड़ाई केदिनों से ही उन्होंने जिस बेबाकपन को अपनाया वह किसी भी दौर में लिखते हुए भी उनकी पहचान बना रहा। नई कहानी के दौर से गुजरते हुए ही अमरकांत ने अद्ïभुत कलात्मक रचनायें देना शुरू कर दिया था। ‘बस्ती’ कहानी अगर देश के भविष्य पर बेबाक टिप्पणी करती है तो ‘हत्यारे’ अपने समय के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने और पीढिय़ों में आयी हताशा से साक्षात्कार कराती है। डिप्टी कलक्टरी अपने समय के एक बड़े सच को उजागर करती है तो गगनबिहारी और छिपकली, बौरइया कोदों जैसी कहानियां ढोंग और अवसरवादिता-काईंयापन पर चोट करती मिलती हैं।
अमरकांत अपनी रचनाओं में  इस बात से बखूबी परिचित मिलते हैं कि इस नंगे-भूखे देश में सबकुछ आशा और निराशा केबीच पेण्डुलम की तरह झूलता ही रहेगा। वे ‘व्यंग्य’ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे और उसकी मार को दवा की तरह। भले ही अमरकांत सामाजिक-राजनीतिक उठापटक से अपने को तटस्थ रखते हों, लेकिन उनकी रचनाएं ऐसा नहीं कर पातीं और हर एक विद्रूपता के खिलाफ चीखती, ‘इन्हीं हथियारों से’ वार करती और सबकुछ ठीक हो जाने की उम्मीद जगाती मिलती हैं। अनगिनत कालजयी कृतियों देने वाले अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार सहित देश के कई बड़े सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। साहित्यकारों के पुरस्कार दिये जाने पर वे टिप्पणी करते हुए सहज भाव से कहते हैं कि ‘कोई लेखक पुरस्कार पाने के लिए थोड़े ही लिखता है। यह भी जान लीजिये कि कोई भी सम्मान या पुरस्कार किसी लेखक को बड़ा नहीं बनाते। प्रेमचन्द, रेणु, निराला बिना किसी पुरस्कार के ही अमर हैं। हां, यह अवश्य है कि पुरस्कार या सम्मान पाने वाले लेखक की अपने समाज और पाठकों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’
कथाकार अमरकांत से यह बातचीत उस लम्बी बातचीत का एक हिस्सा है, जिसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेन्टर ऑफ मीडिया स्टडीज की मीडिया रिसर्च सेल में धरोहर के रूप में सहेजने के लिए किया गया था।  हमें पता था कि अमरकांत जी से बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है तो थमने का नाम ही नहीं लेता। उनके पास आजादी के संघर्ष का आंखों देखा और भोगा इतिहास है तो हिन्दी पत्रकारिता के मंजावट वाले दिनों का अनुभव भी है। वे साहित्य की रचना ही नहीं करते रहे हैं, बल्कि रचनाकारों की कई-कई पीढिय़ां तैयार करने का दायित्व भी उन्होंने निभाया है। यही वजह थे कि हम वीडयिो कैमरा लगाकर बैठ गए और वे बोलते रहे .... अपने समय का इतिहास और  तैयार होते रहे आने वाली कई पीढिय़ों के लिए कई -कई अध्याय। प्रस्तुत हैं उनसे हुई इसी लम्बी बातचीत के कुछ अंश:

पहली कहानी कब लिखी?
प्रश्न सुनते ही मुस्कराते हैं अमरकांत जी। कुछ याद करते हुए कहते हैं- पढ़ाई के दिनों में शरतचन्द को पढक़र कुछ रोमांटिक कहानियां लिखी थीं, लेकिन वे सब कहीं छपी नहीं। वह समय 1940 के आस-पास का रहा होगा। छपने वाली पहली कहानी ‘बाबू’ थी, जो आगरा से निकलने वाले समाचार पत्र ‘सैनिक’ के विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। शायद 1949-50 में (कुछ याद करते हुए)। दुखद यह रहा कि इस कहानी की न तो मेरे पास स्क्रिप्ट ही बची और न ही इसका प्रकाशित रूप। गुम गई ये कहानी। यही वजह है कि मैं हमेशा अपनी पहली कहानी ‘इंटरव्यू’ को कहता हूं, जो पहले प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में मैंने पढ़ी और बाद में 1953 में ‘कल्पना’ में प्रकाशित हुई। इसी कहानी के बाद मैं सम्मानित लेखकों की श्रेणी में शामिल हो गया। फिर तो सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है।
 
आज के कथा लेखकों और उनकी रचनाओं को आप किस रूप में पाते हैं? 
नए लेखकों के सामने उनका समय और उसकी सगााइयां हैं। इन दिनों नई परिवर्तित परिस्थितियां हैं, जो हमारे शुरुआती दिनों से एकदम भिन्न हैं। ऐसा नहीं है कि नए लेखक जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। नई-नई समस्याओं पर लगातार लिखा जा रहा है। कई लेखक तो अपने समय से जूझ कर बेहतर कृतियां देने में सफल भी हो रहे हैं। हां, यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि बहुत से नए लेखक हड़बड़ी में हैं। मेरा मानना है कि मेहनत के बिना अ'छी रचना नहीं लिखी जा सकती है। शैली और भाषा में नए प्रयोग की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन ऐसा कम ही लेखक कर रहे हैं। एक बात और, अब हमारे समय जैसा सहज और सरल समय नहीं रहा और यही वजह है कि नई पर्स्थितियों में रचनाकर्म कठिन होता जा रहा है।

और आलोचकों की परफार्मेंस पर आपकी क्या राय है?
साहित्य में आलोचना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। आलोचना का मतलब सिर्फ आलोचना करना ही नहीं होता, जैसा कि प्राय: देखने-पढऩे को मिलता है। पहले के टीकाकार जो काम करते थे, वही आलोचकों करना चाहिये। अब देखिये, कपिल मुनि के सांख्य दर्शन की मूल प्रति है ही नहीं। उसकी टीका लिखी गयी। वही मिलती है। उसी से इस दर्शन को समझा जाता है। आलोचकों को चाहिये कि वे बेहतर कृतियों को खोजकर उनकी व्याख्या करें, टीका लिखें। मैं यह बात टुटपुंजिए आलोचकों के लिए नहीं कह रहा हूं। गम्भीर रूप से आलोचना कर्म में जुटे लोगों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। कुछ युवा आलोचकों ने उम्मीद जगा रखी है।  

निष्क्रिय पड़ते जा रहे लेखकीय संगठनों को आप क्या सलाह देंगे?
मैं यह नहीं कहूंगा कि वे निष्क्रिय हो गये हैं। वे सब अपनी नई मान्यताओं के अनुरूप काम कर रहे हैं। देखिए, हमारे समय में ये संगठन बहुत अधिक सक्रिय हुआ करते थे। मैं प्रगतिशील विचारधारा का नहीं था, लेकिन ये प्रगतिशीलियों की सक्रियता ही थी कि वे मुझे अपनी ओर ले गये। मैंने अपनी पहली कहानी आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में ही सुनाई। आगरा के बाद जब इलाहाबाद आया तो यहां भी इस संगठन के लोगों ने मुझे अपने से जोड़ लिया। यहां उन दिनों परिमल संगठन भी बहुत सक्रिय था। दोनों ही संगठनों के बीच लेखन में आगे निकल जाने की होड़ मची रहती थी। स्वस्थ्य विमर्श होते थे। मेरा मानना है कि मतभेद होना गलत नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है। इसी से नये रास्त निकलते हैं। संगठनों में होने वाले विमर्श नई पीढ़ी को तैयार हेने का मंच और अवसर उपलब्ध कराते हैं। संगठनों को चाहिये कि मतैक्य न होते हुए भी एक दूसरे का सम्मान करते हुए नई पीढ़ी के रचनाकारों को आगे बढ़ाने के लिए काम करें।

आपने लगभग चालीस वर्ष पत्रकारिता की है। तब और अब की पत्रकारिता में क्या फर्क महसूस करते हैं? 
बहुत फर्क आया है। वेतन के मामले में कई अखबारों व पत्रिकाओं ने सार्थक पहल की है। हमारा समय वेतन के मामले में इतना बेहतर नहीं था। हमने आपातकाल भोगा है और उन दिनों पत्रकारों के समक्ष आने वाले संकट को भी। फिलहाल अब  पत्रिकाओं और अखबारों की प्रस्तुतियों और कंटेंट के वैविध्य में तो ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं,जिनकी कल्पना भर हम अपने समय में करते थे। पत्रकारों के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं। ठीक उसी तरह की चुनौतियां हैं, जैसी लेखकों के सामने हैं। (अमरकांत जी टीवी पत्रकारिता पर कुछ नहीं कहते, शायद कहना नहीं चाहते।)  

आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहने वाले अमरकांत से आज के हालात पर टिप्पणी मांगी जाये तो क्या होगी?
इस प्रश्न पर कुछ देर संयत रहने के बाद अमरकांत जी हंसते हुए कहते हैं-अब भ्रष्टाचार और घोटालों वाले इन हालातों पर क्या टिप्पणी की जाये। हाल के आंदोलन अपने समय को परिभाषित करने के लिए काफी हैं। बदली परिस्थितियों में राजनीति और उसके मानक बदल गये हैं। लोगों की आकांक्षायें बढ़ी हैं और जागरूकता भी। हमारे देश की व्यवस्था जनतंत्र को संतुष्ट कर पाने में विफल सी हो रही है। गांव के लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ गयी है तो शहरी लोगों में राजनीति के प्रति ऊबाहट बढ़ी है। हम ऐसे समय में आ गये हैं जब लोकतंत्र में जनता के अधिकारों की गारंटी की लड़ाई जरूरी हो गई है। ऐसे में मुझे लगता है कि देश में एक सशक्त लोकपाल की नियुक्ति अब बहुत जरूरी हो गई है। एक बात और जिस देश में प्रगतिशील जनतंत्र नहीं होता वह कमजोप पड़ता जाता है।

एक लेखक के रूप में आप सरकार से क्या अपेक्षा करते हैं?
हां, यह सवाल बहुत जरूरी है। मैं जब सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार लेने रूस गया था तो मुझे वहां टालस्टाय और चेखव के घर देखने का मौका मिला। वहां की सरकार ने दोनों ही लेखकों के घर, उनकी चीजों, उनकी किताबों और उन पर लिखी गयी किताबों को धरोहर के रूप में सम्भालने की जिम्मेदारी उठी रखी है। हमारे देश में यह किसी से छिपा नहीं है कि महादेवी, पंत और निराला के घरों और उनकी चीजों का क्या हश्र हुआ है। सरकार ने कभी इस ओर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी है। अरे भाई, किसी लेखक को पुरस्कार या सम्मान दे देने भर से कुछ नहीं होता। पुरस्कार या सम्मान तो लेखन के लिए होता है। सरकार को चाहिये कि बेघर लेखक को घर देने, प्रकाशकों से समय पर उचित रायल्टी दिलाने और उन्हें आर्थिक तंगी से उबारने  की दिशा में भी कदम उठाने की पहल करे और ठोस नीतियां बनाये। सुना है कि बंगाल में ऐसी कोई नीति बनी है, लेकिन पता नहीं यह कितना सच है। हिन्दी लेखकों के लिए तो इस तरह की अब तक कोई पहल नहीं हुई है। सरकार को नए लेखकों और शोधार्थियों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। पढऩे और लिखने की प्रवृत्तियों को जितना प्रत्साहन मिलेगा उतना ही बेहतर समाज और देश हम बना पायेंगे।

आजकल आप क्या लिख रहे हैं? 
नियमित लेखन नहीं हो पा रहा है। ‘एक थी गौरा’ उपन्यास को पुरा करने में जुटा हूं। एक वर्ष में पूरा कर लेने की योजना है। पत्रकारिता पर भी एक उपन्यास लिखने की योजना बनी है। ‘खबरों का सूरज’ नाम के इस उपन्यास में मैं ‘सैनिक’, ‘उजाला’, ‘भारत’ व ‘अमृत पत्रिका’ आदि दैनिक व साप्ताहिक पत्रों व मित्र प्रकाशन की ‘मनोरमा’ पत्रिका में काम करते हुए मिले अनुभवों को पाठकों के साथ बाटूंगा। यह उपन्यास पत्रकारों के संघर्ष और संघर्ष के दौरान यूनियन के नेताओं से मिले धोखे पर आधारित होगा।

एक लम्बी बातचीत के बाद भी उनका चेहरा एक स्फूर्तिभरी दमक लिए हुए दिख रहा था। वे बात करते वक्त यह अहसास ही नहीं होने देते हैं कि हम एक बड़े लेखक के साथ हैं, जिसे देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है और अनगिनत शोधकर्मी जिनपर शोध कर रहे हैं। वे जिस अंदाज में बात करते हैं, वह अपने आप में एक अलग शैली का निर्माण करता है। जीवन की विषमताओं पर लिखते समय या फिर जीवन संघर्ष को चुनौती के रूप में लेते समय, हर बार यही लगता है कि वे अपने यूवा दिनों का स्वतंत्रता आंदोलनकारी रूप को अभी तक भूल नहीं पाये हैं। दूसरों के दुखों, कष्टों, संघर्षों, दुविधाओं को नितांत निजी मानकर रचना कर देने वाले अमरकांत चलते-चलते अपने समय के सच से मुठभेड़ करने की सीख देना नहीं भूलते।

सोमवार, अप्रैल 22

मिशन और मुनाफे की मुठभेड़


धनंजय चोपड़ा
दर्शकों की अटेंशन बेच खाने के खेल पर सरकार ने नजर क्या टेढ़ी की, सारे खबरिया चैनल छाती पीट-पीट कर स्यापा करने लगे हैं। तोहमत लगाई जा रही है कि युरोप की व्यवस्थाओं का नकल करने वाली सरकार अपने देश की परिस्थितियों से वाकिफ नहीं है, जबकि ट्राई यानी टेलीकॉम रेगुलेट्री अथार्टी ऑफ इण्डिया ने एक घंटे में केवल 12 मिनट ही विज्ञापन दिखाने के नियम का प्रस्ताव करके कोई नया कदम नहीं उठाया है, बल्कि पहले से मौजूद व्यवस्था को नए ढंग से रखा है ताकि उस पर अमल किया जा सके। इधर ट्राई का फरमान जारी हुआ उधर तत्काल नेशनल ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन और इण्डियन ब्रॉडकास्टिंग फाउण्डेशन ने सूचना प्रसारण मंत्री से मिलकर अपना विरोध दर्ज करा दिया। बहरहाल अब बहस चल पड़ी है तो हाशिए पर फेंक दिए गए दर्शकों के बीच से होकर गुजरेगी और पक्ष-विपक्ष के तमाम मुद्दे सामने आएंगे।
वास्तव में ट्राई ने कहा है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय और ब्रॉडकास्टर से इकट्ठे किए गए आंकड़े बताते हैं कि देश के टीवी चैनल, 'केबिल टेलीविजन नेटवक्र्स रूल्स-1994Ó का पालन करने में कोताही बरतते हैं। सच भी यही है कि विज्ञापन दिखाए जाने वाले निर्धारित समय को लेकर लगभग सभी चैनल 1994 में ही अस्तित्व में आ गए नियमों को ठेंगा दिखाकर मुनाफे की होड़ में शामिल हैं। ट्राई ने तो बस इन्हीं नियमों को पालन करने को अनिवार्य बनाने की बात कही है। हो हल्ला मचाने वालों का तर्क है कि 1994 में भारत सरकार ने युरोप में बने नियमों की नकल की थी, लेकिन उसने यह नहीं देखा था कि वहां के टीवी चैनलों की आमदनी के मॉडल और भारत के चैनलों की आमदनी के मॉडल में बहत फर्क है। भारत में चैनलों के अलम्बरदारों का कहना है कि चैनलों के खर्च के लिए विज्ञापनों पर निर्भरता नब्बे प्रतिशत है और सबक्रिप्शन फीस से होने वाली आमदनी नगण्य है। जबकि युरोप के देशों में चैनलों की आमदनी का सत्तर प्रतिशत सबक्रिप्शन फीस से ही आता है। बहरहाल ट्राई का फैसला ऐसे समय में आया है, जब पूरे देश में टेलीविजन नेटवर्क के डिजिटाइजेशन को मुहिम के तौर पर पूरा किया जा रहा है। यह काम लगभग सभी बड़े शहरों में पूरा भी हो चला है। यही वजह है कि ट्राई, ब्रॉडकास्टर्स की दलीलों को औचित्यपूर्ण मानने से कतरा रही है।
वैसे सारा खेल खुद न्यूज चैनलों द्वारा ही चौपट किया गया है। समस्या तो तभी शुरू हो गई थी जब लगभग सभी चैनल आगे निकल जाने और टीआरपी की होड़ में शामिल हो गए थे। पूंजी और मुनाफे की गणित में दर्शक बेचारा 'उपभोक्ताÓ बन कर रह गया और उसके हिस्से खबरें टीवी स्क्रीन से गायब हो गईं। दर्शकों को बेवजह हंसने पर मजबूर किया जाने लगा या फिर स्क्रीन पर रिएलिटी शो के बहाने इमोशनल ब्लैकमेलिंग का शिकार बनाया जाने लगा। खबरों के लिए तरसते दर्शकों को कभी स्पीड में तो कभी बुलेट की तर्ज पर खबरों का शतक लगाने का हुनर दिखाया जाने लगा। यह अकारण नहीं है कि इधर टेलीविजन न्यूज चैनल खबरों की हॉफ सेंचुरी और फुल सेंचुरी लगाने में मस्त थे और उधर दर्शकों ने अपने पुराने साथी अखबार से जुडऩा ठीक समझा। अकेले उत्तर प्रदेश में पिछल दस वर्षों में कई अखबारों के नए-नए संस्करण शुरू हुए हैं तो कई अखबारों ने अपने संस्करणों को यहां से निकालना शुरू कर दिया है और करते जा रहे हैं। मजेदार बात तो यह है कि ट्राई के फैसले को गलत ठहराने वाले न्यूज चैनलों के संगठन इसे 'रेगुलेशन ऑफ एडवरटीजमेंटÓ के बहाने 'कंट्रोल ऑफ कण्टेंटÓ की संज्ञा दे रहे हैं। यहां तक कि इसे संविधान में मिले नागरिक अधिकारों का हनन भी बताया जा रहा है। हर बार की तरह इस बार भी उंगली उठने पर टीवी के अलम्बरदार 'सेल्फ रेगुलेशनÓ की बात करने लगे हैं। इस बात पर न तो किसी को शर्म आ रही है और न ही कोई गम्भीर है कि सेल्फ रेगुलेशन का टोटका अब मजाक बन कर रह गया है।
यह तो कहिए कि भारत में अभी 'कन्ज्यूमर फोरमÓ की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर के  'टेलीविजन दर्शक एसोसिएशनÓ नाम के संगठन नहीं बने हैं, वरना टेलीविजन चैनलों का नाकड़ा बंद कर दिया गया होता। वैसे इस तरह के संगठनों की जरूरत महसूस की जाने लगी है। दर्शकों को बिना अहसास कराए उनकी अटेंशन को बेच खाने वालों पर कहीं न कहीं से अंकुश बनाए रखने की कवायद तो होनी ही चाहिए। हो सकता है कि अपने देश में भी जल्दी ऐसे संगठन बने और फिर चेलीविजन चैनलों के अलम्बरदारों के साथ 'दर्शक खबरदारोंÓ की भी नीति निर्धारकों में शामिल किया जाने लगे। अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय मीडिया के लिए नए समय की शुरूआत होगी।      
फिलहाल मुनाफे की होड़ और नकल मारने की भेड़ चाल का शिकार टीवी न्यूज मीडिया पिछले पांच वर्षों में ऐसा कुछ भी नया नहीं कर पाया है, जिसे पत्रकारिता के मिशन की कसौटी पर कसा जा सके। जिस किसी ने भी मिशन की बात की, उसे पुराने जमाने का मानकर हाशिए ढकेल देने में ही भलाई समझी। हर किसी को समझा दिया गया कि इण्डस्ट्री है तो पूंजी लगेगी ही और पूंजी लगी है तो मुनाफे की बात तो सोचनी पड़ेगी। लेकिन मुनाफे के लिए उपभोक्ता को ठगा जाना जरूरी है, यह तो नियम नहीं है। यह शायद मीडिया इण्डस्ट्री में ही होता हो कि उपभोक्ता की सुनने वाला कोई नहीं है। मिशन और मुनाफे में फंसी मीडिया के मानिंद भी इस मसले पर चुप्पी साधे रखने पर ही भलाई समझते हैं।

कोऊ नृप होय, हमें का हानि


गद्दी खाली थी। कई बरसों से खाली थी। परम रानी का शासन था, जिस अपने अलावा कोई और राजा का होना पसंद ही नहीं था। सत्ता बदली। परम रानी गई और परम राजा का शासन आ गया। उधर सत्ता बदली और इधर खाली पड़ी गद्दी पर लोगों की निगाह लग गई। कई की लार टपकने लगी। दावेदारी ठोंकी जाने लगी। परम दरबार में फेरा लगने लगा और दरबारी होने का दावा ठोंका जाने लगा। परम राजा के पास नामों की झड़ी लगी तो एक लम्बी फेहरिस्त ही तैयार हो गई। राजा बनने की होड़ में शामिल लोगों की फेहरिस्त बार-बार दोहराई जा रही थी और हर बार कोई न कोई नया नाम जुड़ जा रहा था। राजा बनाने वाले परम राजा के सामने असमंजस था कि किसे राजा बनाए और किसे नहीं। परम्पराएं और फेहरिस्त का दबाव उसे परेशान किए हुए था। कोई जाति का आधार देकर दावा ठोंक रहा था तो कोई धर्म और भाषा की अल्पसंख्यकता का हवाला देकर दबाव बनाने में लगा हुआ था। एकाएक नया फार्मूला सामने आया और राजा ने उसे तत्काल आयात कर लिया और एक तथाकथित 'बाहरीÓ गद्दीनशीं कर दिया गया। फेहरिस्त में शामिल लोग सीना पीट-पीट कर स्यापा करने लगे।
जब चौबीस नामों वाली फेहरिस्त अखबार वाले छाप रहे थे, तब एकमत होकर किसी एक का नाम देने से गुरेज करने वालों को रोते देख मजा आ रहा है। राजा मस्त है कि आपस में लड़ाई का मजा तो बाहर वाले ही उठाते हैं, सो उसके हिस्से में यह मजा अपने आप ही आ गया। जय हो राजा बनाने वाले की। राजा नई-नई घोषणाएं कर रहा है और स्यापा कमेटी परम राजा के दरबार में गुहार लगाने की जुगत भिड़ा रही है। इतिहास गवाह है कि राजा बनाने के खेल में जो जीता वही सिकंदर चलता है। जनता के दबाव में निर्णय बदलने की परम्परा तो है, लेकिन इसका निर्वहन करने के लिए वर्तमान राजा का कार्यकाल खत्म होने का इंतजार करना पड़ेगा। लोकतंत्र है भाई। अगली बार का इंतजार करें। आपको राजा बदलने का मौका अवश्य मिलेगा।
एक मजेदार बात यह कि 'आग लगाकर जमालो बीबी तमाशा देखेंÓ वाली कहावत चरितार्थ होते दिख गई। अब देखिए न पहले तो साथ देने का वादा किया कुछ बड़ों ने और फिर राजघराने से सम्बन्ध बिगडऩे के डर से वे भाग खड़े हुए। बेचार स्यापा करने वाले जिनकी अगुवाई में लड़ाई लडऩे का मन बना रहे थे, उनके साथ छोड़ देने से सकते में आ गए, लेकिन वाह रे जज्बे, उसने साथ नहीं छोड़ा और मैदान में जंग की गूंज अभी भी सुनाई दे रही है। इधर नए राजा ने भी बड़ी ही चतुराई से कई लोगों को अपने पक्ष में करने की जुगत भिड़ा ली। पिछले राजाओं से जिन्हें कुछ नहीं मिला वे नए राजा की जय-जयकार करने में लग गए। इस उम्मीद पर कि शायद नया राजा अपने गाढ़े समय में उनका साथ पाकर गदगद हो जाए और उन्हें राजा का दरबारी होने का मौका दे दे। बहरहाल अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें राजा के बदलने और न बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब राजा और प्रजा के रिश्तों में मिठास न हो, जब यह पता हो कि राजा उनके लिए कुछ करेगा ही नहीं, जब पता हो कि राजा के पास केवल वही होंगे जो राजा की जय-जय बोलते रहेंगे, जब पता हो कि राजा उनके कर्म का सहभागी नहीं होगा....तो फिर कोऊ नृप होय, हमें का हानि।
बहरहाल जिनका नाम फेहरिस्त में था, वे सब के सब सदमे में हैं कि परम राजा के प्रसादपर्यन्त राज्य मंत्री का दर्जा हासिल करने से वे क्योंकर चूक गए। लाल बत्ती का सुरूर कितना मजेदार होता है, इसका स्वाद चखते-चखते रह गए। नया राजा जो बयान दे रहा है, वह भी कचोट रहा है। नया राजा यह बता रहा है कि उसने कौन-कौन से तीर मारे हैं तब जाकर परम राजा ने उस राजा होने का गौरव दिया है। वह परम राजा के कसीदे पढ़ रहा है और स्यापा करने वाले बिलबिला जा रहे हैं। कसीदे तो वे भी पढ़ सकते थे। यह तो केवल 'मंचीयÓ कसीदे पढ़ रहा है, हम तो किताबों में दर्ज होने लायक 'गंभीरÓ कसीदे पढ़ सकते थे। हाय, फिर हम कैसे चूक गए। अब चूक गए तो चूक गए। बहरहाल बेमानी लड़ाई लडऩे में माहिर लोग भी इस स्यापा कमेटी में शामिल हो गए हैं और अब यह कई बरस तक इस लड़ाई को ढोते रह जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। बहरहाल लड़ाई लडऩे वाले अपने हैं सो उन्हें लड़ाई जीत लेने की ढेर सारी शुभकामनाएं।

'हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर बवाल



धनंजय चोपड़ा
'हिन्दुस्तानी भाषा के लिए काम करने वाली देश की अकेली संस्था हिन्दुस्तानी एकेडेमी को लगभग सात वर्षों बाद अध्यक्ष तो मिल गया, लेकिन एक नए ढंग के बवाल के साथ। लगातार कई बरसों से इलाहाबाद में इस संस्था के लिए अध्यक्ष की मांग करने वाले इलाहाबादी साहित्यकार इस समय गुस्से में हैं कि प्रदेश की सरकार ने उनके अपने बीच के साहित्यकारों को खारिज करते हुए दिल्ली के कवि डा. सुनील जोगी को अध्यक्ष बना दिया है, जबकि परम्परा रही है कि शहर के ही किसी वरिष्ठ साहित्यकार को यह पद दिया जाता रहा है। बहरहाल शहर के साहित्यकारों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर अपना विरोध सरकार के दरबार में गुंजाने का मन बना लिया है। उधर विरोध को दरकिनार कर जोगी ने पदभार ग्रहण करके सबको मना लेने की बात कही है।
आजादी की लड़ाई के दिनों में जब भाषा को हथियार बनाकर देश के लोगों को एक करने और उन्हें निज भाषा के गौरव के प्रति जागरूक बनाने की मुहिम चल रही थी, तभी 1926 में इस संस्था की स्थापना की गई थी। इस संस्था से राय राजेश्वर बली, यज्ञ नारायण उपाध्याय, सर तेज बहादुर सप्रू, डा. धीरेन्द्र वर्मा, डा. ताराचन्द्र, हाफिज हिदायत हुसैन, बालकृष्ण राव, डा. राम कुमार वर्मा, डा. जगदीश गुप्त, डा. रामकमल राय, प्रो. अकील रिजवी, हरिमोहन मालवीय, कैलाश गौतम आदि साहित्यकार व भाषाविद् किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं,जिनके नेतृत्व में यहां शोध व प्रकाशन के कई महत्वपूर्ण काम होते रहे हैं। पिछली मुलायम  सिंह यादव की सरकार ने भाषाविज्ञानी डा. वाई. पी. सिंह को इसका अध्यक्ष बनाया था, लेकिन वे दो बरस भी इस पद पर नहीं रह पाए थे कि उन्हें प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का शिकार होना पड़ा। बसपा सरकार के आते ही उन्हें पद से हटा दिया गया और फिर यह पद एक अदद साहित्य व भाषा सेवी के लिए तरसता रह गया। एक बार फिर सपा सरकार के सत्ता में आते ही जब भाषा और साहित्य को समर्पित संस्थाओं में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों का दौर चला तो इलाहाबादी साहित्यकारों का एक तबका पूरे जोर शोर से कई-कई नाम उछालने और उनकी-अपनी पैरवी करने में जुट गया। एक समय तो ऐसा आया कि स्थानीय अखबारों ने तो दर्जन भर लोगों का नाम छाप कर बताया कि इतने लोग अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हैं। रोचक यह कि इस पद को पाने के लिए जातीय और धार्मिक आरक्षण दिये जाने तक की गुहार लगने लगी।
बहरहाल राज्य मंत्री का दर्जा हासिल इस पद पर सपा सरकार ने इलाहाबादियों की दलीलों और उनकी सुझाई फेहरिस्त को किनारे कर दिल्ली के कवि डा. सुनील जोगी को अध्यक्ष बना दिया है। कवि सम्मेलनों के जान-पहचाने चेहरे रहे डा. जोगी ने विरोध को खारिज करते हुए कहा है कि ''कोई साहित्यकार किसी दूसरे की बराबरी नहीं कर सकता है। लेकिन मेरा भी साहित्य में दखल है। तेरह साल पहले दिल्ली सरकार की हिन्दी एकेडेमी का सहायक सचिव रहा हूं। 75 किताबें लिखीं हैं, जिनमें से दस तो भाषा विज्ञान की ही हैं। हिन्दी से एमए किया है। अवधी भाषा पर पांच वर्ष शोध किया है। कई मंत्रालयों में हिन्दी को लेकर काम किया है। सरकार ने कुछ सोच-समझ कर ही मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी है। मैं सभी से रचनात्मक सहयोग लेकर एकेडेमी चलाना चाहता हूं। ÓÓ
बहरहाल डा. जोगी का विरोध का झंडा बुलंद करने वाले कोई दलील मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार ने इलाहाबादी साहित्यकारों का अपमान किया है। विरोध करने वालों का कहना है कि सरकार जिसे चाहे उसे नियुक्त करे, यह उसका अधिकार है, लेकिन संस्था की गरिमा का ख्याल करके ही उसके पदों पर नियुक्तियां होनी चाहिए। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर बड़े ख्यातिनाम साहित्यकार और भाषाविद् ही नियुक्त होते रहे हैं। अभी इलाहाबाद में अमरकांत, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, अकील रिजवी सहित कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इस पद पर बैठा कर गरिमा को बरकरार रखा जा सकता था। बहरहाल विरोधियों ने अपनी बातों का एक प्रस्ताव बनाकर मुख्यमंत्री को भेजने का मन बनाया है और इसके लिए हस्ताक्षर अभियान भी शुरू कर दिया है। हस्ताक्षर करने वाले प्रारम्भिक लोगों में जनसंस्कृति मंच के प्रो. राजेन्द्र कुमार, जनवादी लेखक संघ के विवेक निराला, प्रगतिशील लेखक संघ के अविनाश मिश्र, अजित पुष्कल, हरिश्चन्द्र पाण्डेय, प्रो. ए.ए. फातमी, मत्स्येन्द्र नाथ शुक्ल आदि शामिल हैं। बहरहाल वादों और संघों की राजनीति में बंटे इलाहाबादी साहित्यकारों की फौज में से कुछ जोगी के पक्ष में खड़े हो गए हैं। जोगी ने भी कहा है कि इलाहाबाद में उन्हें जानने और पहचानने वाले बहुत हैं, उन्हें साथ लेकर मैं अपना काम प्रारम्भ करूंगा, धीरे-धीरे सब साथ आ जाएंगे। जोगी के इस बयान के पहले अखबारों में कथाकार दूधनाथ सिंह, प्रो. ए.ए. फातमी सहित कई लोगों का का यह बयान छपा था कि वे जोगी न तो जानते हैं और न ही उनका कभी नाम ही सुना है।
अध्यक्ष पद की रार के बीच एकेडेमी के एक पूर्व अध्यक्ष का कहना है कि इधर कई बरसों से एकेडेमी अपने मूल उद्देश्यों से भटकी हुई है। इस हिन्दी-उर्दू भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली संस्था के रूप में प्रचारित करने वाले इसी के आधार पर अपने-अपने लिए पद की मांग करते हैं। जबकि यह संस्था देश की सभी भाषाओं को एक मंच पर लाकर काम करने के उद्देश्य से बनी थी। उत्तर प्रदेश में यही एकमात्र संस्था हैं जो सभी भाषाओं को साथ लेकर कुछ सार्थक कर सकती है। सरकार को इसका अध्यक्ष बनाते समय इसका ध्यान रखना चाहिए था। उन्होंने शोध व प्रकाशन के लिए एकेडेमी को बड़ा बजट देने की मांग भी की है।  बहरहाल अब प्रदेश के  मुख्यमंत्री के दरबार में ही तय होगा कि इलाहाबादी साहित्यकारों की सुनी जाती है या फिर हर विरोध की तरह यह भी टांय-टांय फिस्स हो जाता है।
                                 

चैनलों ने कर दिया खबरों का गैंग रेप


धनंजय चोपड़ा
टेलीविजन खबरिया चैनलों ने एक बार फिर अपनी मेच्योरिटी पर प्रश्नचिन्ह लगवा लिया। सब के सब ठीक उसी तरह की होड़ में शामिल दिखे जिस तरह की अन्ना के आंदोलन के समय। दिल्ली के गैंग रेप काण्ड के बाद कुछ खबरिया चैनलों का रवैया तो इस तरह दिख और समझ में आ रहा था कि लोगों द्वारा किए जा रहे स्वत:सफूर्त आंदोलन के कर्ता-धर्ता वही हैं। यही नहीं टीवी पर जो बेमानी बहसें कराई जा रही थीं, उसे शायद ही कोई समझदार दर्शक देख-सुन रहा होगा। एक अहम मुद्दे को किस तरह बेअसर किया जाता है, यह उन तमाम खबरिया चैनलों ने अपनी बहस के कार्यक्रमों में कर दिखाया। शायद ही किसी चैनल ने इस बात पर गौर करने की जुर्रत की कि देश की राजधानी में निजी परिवहन व्यवस्था पर चोट किस तरह की जा सकती है? किस तरह इस तरह की घटनाओं को दोबारा होने से रोका जा सकता है? न तो किसी 'सरकारी जिम्मेदारÓ को पत्रकारीय अंदाज में घेरने की कोशिश की गई और न ही अहम मुद्दे उठाकर सरकार को मुश्किल में डालने का प्रयास हुआ। भीड़ को दिखाते रहे ताकि लोगों का ध्यान जरूरी मुद्दों की तरफ जाए ही नहीं। सवाल तो यह उठता है कि कहीं इस तरह के खबरिया खेल कार्पोरेटी मीडिया और सत्ता के बीच की नूरा कुश्ती के पर्याय तो नहीं हैं? कहीं इस दौरान लोगों का ध्यान अहम मुद्दों की तरफ जाने से रोकने की कोशिश का हिस्सा तो नहीं? और यदि ऐसा है तो क्या इसे खबरों का गैंगरेप नहीं कहा जाना चाहिए?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में जो कुछ हुआ वह दरिंदगी की हदों को भी पार करने वाला था। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि युवाओं ने सडक़ों पर उतर कर जिस तरह विरोध प्रदर्शन किया वह जरूरी था। इंकार तो इस बात से भी कोई नहीं कर सकता कि जिन परिवारों की बेटियां घर से बाहर रहकर पढ़ रही हैं या फिर नौकरी कर रही हैं वे टीवी कवरेज और बेमानी बहसों से दहल से गए हैं। बात यह भी सही है कि देश व समाज को सही रास्ते पर चलाने के लिए कड़े कानूनों की जरूरत पड़े तो देर नहीं होनी चाहिए। लेकिन, क्या हमारे खबरिया चैनल इस तरह कोई दबाव सरकार पर बना पाने में सफल हो पाए? शायद नहीं।  महज लगातार एक ही तरह की खबरों को दिखाकर या फिर एक ही तरह की बहसों को दिखा कर पत्रकारीय दायित्वों की पूर्ति हो जाती है। खबरों के मायने ये कब से होने लगे कि आप पड़ताल करने की आदत को ही भूल जाएं। खबरों के मायने तो यह भी नहीं है कि आप 'चूज एण्ड पिकÓ की नीति अपनाएं। कहा तो यह भी जा सकता है कि टीवी खबरों के अलम्बरदारों को अपने मतलब का हप्प और बाकी सब थू करने की कहावत को चरितार्थ करना भाने लगा है। सच तो यही है कि इक्का-दुक्का चैनलों को छोडक़र किसी ने भी दरिंदगी की इस घटना की तहों तक जाने की कोशिश ही नहीं की और केवल आम आदमी की इमोशनल ब्लैकमेलिंग से काम चलाते रहे।
वैसे इस पूरे घटनाक्रम और चैनलों के बचकाने रवैये ने एक बार फिर टेलीविजन चैनलों के लिए नियामक तंत्र बनाने की मांग जोर पकड़ा दी है। ऐसा इसलिए भी कि सेल्फ रेगुलेटिंग का फण्डा इनके लिए उतना कारगर नहीं है जितना कि उसे लेकर चिल्ल-पों मचाया जाता है। अधिकांश खबरिया टीवी चैनल अभी भी यह मानते हैं कि भारतीय दर्शकों का बड़ा हिस्सा आसानी से इमोशनली ब्लैकमेल हो सकता है और उसे खुद से जोडऩे का एक ही तरीका है कि उसे सही मुद्दों और और उसके हिस्से की असल खबरों से दूर रखा जाए। पिछले दिनों एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि टीवी चैनल पत्रकारिता के चार मूल कामों में से तीन को यानी लोगों को सूचना देने, गाइड करने और शिक्षित करने को पूरी तरह भुला चुके हैं। उन्हें बस चौथा काम याद है और वह है लोगों का मनोरंजन करना। वास्तव में खबरों के नाम पर टाइम पास का खेल चलाने में तो कई टेलीवजन खबरिया चैनल पहले से ही माहिर हो चुके हैं और अब जो बचा-खुचा खबरों का हिस्सा था उसके भी गायब होने का सिलसिला शुरू हो चुका है। देखा जाए तो तमाम खबरिया चैनलों को रोज-ब-रोज ऐसे मुद्दों की तलाश रहने लगी है, जिसे वे लगातार जिंदा रख सकें और अपना खबरों के नाम पर टाइम पास करने का उल्लू सीधा करते रहें। बेचार दर्शक खबरों की लालसा लिए एक चैनल से दूसरे चैनल पर निगाहें डालता रह जाता है और उसे असल खबरों की जगह छद्म खबरें या तो बेमानी बहसों के रूप में मिलती हैं या फिर एक ही दृश्य को बार-बार दिखाने के रूप में। ये दृश्य किसी घटना के हो सकते हैं या फिर किसी नामचीन हस्ती के बयान के।
अंत में एक जरूरी सवाल कि क्या टेलीविजन खबरिया चैनल इस बात पर गौर करना चाहेंगे कि प्रिंट मीडिया अपनी स्मृति परम्पराओं का पालन करते हुए किस तरह आज भी लोगों का विश्वास पाए हुए है? सच यह है कि खबरों की असल खुराक आज भी अखबारों और पत्रिकाओं से ही मिल रही है। यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं कि अखबारों ने हर मौके पर दिखाया है कि असल मीडिया वही हैं। यही वजह है कि अखबारों के नए संस्करण सामने आ रहे हैं और पाठकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ चैनलों पर घूस मांगने के आरोप लग रहे हैं और संपादक जेल जा रहे हैं। 'डेफिसिट अंटेंशन थ्योरीÓ को समझना अब हर चैनल के लिए जरूरी है, वरना टेलीविजन से खबरिया चैनलों की अहमियत खत्म होते देर नहीं लगेगी। डर तो यह है कि कहीं टेलीविजन से इनके गायब होने के संदर्भ में 'गधे के सिर  से सींग गायबÓ होने वाली कहावत चरितार्थ न हो जाए।  ।