गुरुवार, सितंबर 4

बेचारी बहस और बेमानी बहसिए

वे अपनी ही रौ में कहते जा रहे थे और उनके साथ शामिल लोग उनकी बात को काटने में लगे हुए थे। इन सब को एक साथ जूझते देख कुछ-कुछ चांव-चांव या कांव-कांव या फिर हुंआ-हुंआ का भाव आ रहा था। बहरहाल बीस मिनट बीत जाने के बावजूद भी पता नहीं चल पाया कि आखिर रार किस मुद्दे पर मची हुई है। दरअसल लाख आलोचनाओं के बावजूद समाचार चैनलों पर बहस के लंबे-लंबे उबाऊ कार्यक्रमों पर न तो रोक लग रही है और न ही उसके घिसे-पिटे फार्मेट में कोई बदलाव लाने की कोशिश हो रही है। यह कहना गलत न होगा कि बेतुकी और बे- सिर-पैर की बात करने वालों की बढ़ती फौज का फायदा उठाने में लगे समाचार चैनल महज समय बिताने के नाम पर ऐसे कार्यक्रमों की होड़ में शामिल हो चुके हैं। उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता कि उनका अपना हम-दम दर्शक इन बकवास मुद्दों (अधिकांशत:) पर होने वाली बेचारी बहसों और बेमानी बहसियों से ऊब सी गई है। कभी-कभी तो लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  इण्डस्ट्री ही एकमात्र ऐसी इण्डस्ट्री है, जिसे अपने उपभोक्ताओं की कोई परवाह नहीं है, वरना ब्रैण्डिंग और पैकेजिंग के इस समय में हर उद्योग अपने उपभोक्ता को सिर-माथे पर रखकर साथ निभाने के दबाव में नजर आ रहा है।
अब पिछले दिनों को ही लीजिए, पहले सरकारी सूत्रों के हवाले से यह खबर प्रसारित की गई कि केन्द्र सरकार पांच लोगों को भारत रत्न दिए जाने की तैयारी कर रही है। कई चैनलों ने उन नामों पर भी कयास लगा डाले जिन्हें भारत रत्न दिया जा सकता है या उनकी नजर में वे इसके हकदार हैं। नामों का चयन तमाम चैनलों में बैठे तथाकथित मीडिया अलम्बरदारों ने सत्ताधारी पार्टी लाइन के आधार पर तय कर दिए। कयासों पर सरकारी मुहर लगती कि इससे पहले ही उन नामों को बेमानी बहसिओं के हवाले कर दिया गया और फिर शुरू हो गया  चांव-चांव, कांव-कांव, हुंआ-हुंआ का दौर। हर कोई अपने-अपने हिसाब से भारत रत्नों की खोज कर रहा था और उन्हें बिना सोचे-समझे बहस में शामिल कर ले रहा था। किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि देश के जिन सपूतों को ये सब भारत रत्न देने की मांग के साथ अपनी बेचारगी से लथपथ बहस में शामिल कर रहे हैं, वे अपने देश की जनता के दिल और दिमाग में क्या जगह रखते हैं। चैनलों ने भी इन सपूतों के नामों को इन बेमानी बहसिओं की लपालप चलती बेमानी जुबानों पर आने देने में कोई बुराई नहीं समझी। बहस में भारत रत्न के हकदारों में हनी सिंह भी शामिल हो गया। अब आप इस दुर्गति को क्या कहेंगे।
एक चैनल को 'हिन्दी, हिन्दुस्तान और हिन्दूÓ का जुमला भा गया और उसने इस पर बहस करने के लिए आरोप-प्रत्योरोप में माहिरों को जुटाकर जो बहस कराई, वह किसी साम्प्रदायिकता फैलाने वाले कार्यक्रम की तरह ही लगी। जनाब एंकर महोदय लगातार अपने चहेते बेमानी बहसिओं को उकसाते नजर आए कि वे आपसे में तो भिड़ें ही साथ में ऐसा कुछ बोलें कि आम जनता भी आपस में भिड़ जाए। इसी तरह नेताओं के संसद से गायब रहने वाली बहस ने नेताओं को अपने दायित्वों को निभाने से वाकओवर सा दे दिया। इस बहस को देख-सुन कर ऐसा लग रहा था कि यह बहस संसद से गायब रहने का आरोप झेल रहे सांसदों की ओर से प्रायोजित की गयी हो। वैसे 'पेड न्यूजÓ और 'पेड व्यूजÓ का आरोप झेलने वाली मीडिया के लिए नया नहीं है। पहले भी कई बार इस तरह का आभास मिलता रहा है कि खबरिया चैनल प्रायोजित मुद्दे पर प्रायोजित बहसिओं को लेकर बेमानी बहस कराने में जुटे हैं।
बेचारे खबरिया चैनल। इन दिनों सुबह से ही इस बात में जुट जाते हैं कि आज शाम किन मुद्दों पर बहस हो सकती है और इन मुद्दों पर कौन लोग बात रख सकते हैं। हर चैनल के पास दो-तीन समाजशास्त्री, दो-तीन अर्थशास्त्री, दो-तीन विधि विशेषज्ञ और दो-तीन साहित्यकार टाइप के लोगों की फेरिस्त तैयार रहती है। राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं या फिर टेलीविजन बहसों में शामिल होने के लिए नामित नेताओं की फेहरिस्त भी पास में होती है। चैनलों में एक पूरी टीम होती है इन लोगों को आमंत्रित करने या फिर उन्हें बहस के दौरान कनेक्ट करने की। कई बार तो बहसिओं से राय-मश्विरा करके ही विषय का टयन होता है या फिर विषय को अंतिम रूप दिया जाता है। साथ ही इस बात की कोशिश की जाती है कि विषय ऐसा हो, जिसमें विषय से इतर जाकर आरोप-प्रत्यारोप लगाने और आंय-बांय शांय बकने की भरपूर गुंजाइश हो।
फिलहाल 'शर्म उन्हें आती नहींÓ कहकर ही काम चलाने वालों की बड़ी फौज होने के कारण बेचारी बहसों और बेमानी बहसिओं का दौर जारी है। ऐसी कोई नियामक संस्था ही नहीं है जो खबरिया चैनलों पर आयोजित या फिर प्रायोजित होने वाली इन बहसों में कहे जाने वाले 'वाक्योंÓ को स्वयं ही संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करे या फिर दिशा-निर्देश दे सके। हां, एक खबर कुछ भरोसा दिलाती है या फिर संशय में डालती है कि आने वाले दिन सुधार के हो सकते हैं या फिर मीडिया पर नकेल कसे जाने के हो सकते हैं। और खबर यह है कि देश के सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा है कि एफएम रेडियो पर रेडियो जॉकी किसी का मजाक नहीं उड़ा सकेंगे। उन्होंने इन रेडियो पर प्रसारित होने वाले कंटेंट पर भी निगरानी रखने की बात कही है। तय है कि जल्दी ही इन बहसों के लिए भी मानक बनाए जाएं। अगर ऐसा होता है तो यह खबरिया चैनलों के उपभोक्तोओं के लिए बेहतर खबर होगी।  

रविवार, अगस्त 17

बात कहने के बहाने और रास्ते


पिछले दिनों मैं एक स्टडी ग्रुप के साथ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की यात्रा पर था। मकसद था आदिवासियों की जीवन शैली के अनुरूप कम्युनिकेशन टूल्स की पहचान करना। यह ग्रुप ऐसे समय वहां पहुंचा था जब पूरा देश इस बहस का हिस्सा बना हुआ है कि आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में किस तरह लाया जाये। राइट टु इनफार्मेशन के इस समय में उन्हें उनके अधिकारों और उनके लिए उपलब्ध कानूनों व सरकारी योजनाओं की जानकारी से लैस कराने के लिए कौन सा कम्युनिकेशन टूल कारगर होगा, तलाश का मुख्य मुद्दा था। इसे लेकर ग्रुप के सभी सदस्यों के पास अपनी-अपनी सोच थी। लेकिन यह सभी जानते थे कि यह काम उतना आसान नहीं है, जितना समझा जा रहा है।
फिलहाल हम सभी मीडिया में खुद को माहिर समझने वाले लोग अपनी-अपनी सोच के साथ बस्तर में थे। एक ऐसे इलाके में जिसे वहां से बाहर रहने वाले लोग अत्यन्त पिछड़ा मानते हैं। हमारे सामने कला और सम्प्रेषण के तरीकों का इतना बड़ा जखीरा था कि सहसा हमें लगा कि हमारी पूरी यात्रा ही बेमानी है। मुझे यह कहने में कतई गुरेज नहीं कि कम्युनिकेशन के जितने कारगर टूल्स आदिवासी कहे जाने वाले लोगों के पास हैं, शायद उतने टेक्नोलाजी बेस्ड समाज के आधुनिक कहे जाने वाले लोगों के पास नहीं हैं। बड़ी बात यह कि उनके टूल्स एक साथ कई-कई मैसेज देने में सक्षम हैं और हर मैसेज की अपनी सार्थकता को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता।
मैं यहां अपने कुछ अनुभव शेयर करना चाहता हूं। सबसे पहले मैं बात करूंगा आदिवासी चित्रकार पेमा फात्या की। झाबुआ में रहने वाले इस चित्रकार से मैं कई वर्षों पहले भी मिला था। पिथौरा चित्रकला में माहिर इस बुजुर्ग चित्रकार की कृतियों में प्रकृति को बचाने से लेकर समाजिक सौहाद्र्र और साक्षरता के सहारे खुद के जीवन को बेहतर बनाने के संदेश मिल जाते हैं। रोचक बात यह कि यह सभी बातें अकृतियों और रंग संयोजन के माध्यम से कहा जाता है और बड़ी ही सहजता से समझ में भी आ जाता है। झाबुआ की दीवारों पर बने ये चित्र जितनी सरलता से भील जाति के लोग पढ़ लेते हैं शायद उतनी सरलता से उन्हें किसी आधुनिक आफसेट मशीन में छपे कलरफुल पोस्टर को पढ़ाने के लिए कफी मशक्कत करनी पड़े। हमने झाबुआ के आस-पास के इलाकों में दीवारों पर बने चित्रों को पढऩे की जितनी बार कोशिश की उतनी बार हर एक चित्र एक नया मैसेज देता हुआ मिला। बात कहने की सबसे पुरानी विधा इतनी सशक्त ढंग से हमारे सामने थी कि हम सभी चमत्कृत थे।
मैं अपनी इस यात्रा की एक और फाइन्डिंगस आपके साथ शेयर करता हूं। वह है वहां के लोगों का रेडियो प्रेम। अपनी भाषा और अपनी संस्कृति में रचे-बसे ये लोग आधुनिक कही जाने वाली दुनिया के लोगों के सरीखे ही हैं। इनमें से कुछ युवा इलाके के पास के शहरों में पढ़ाई करने या रोजी कमाने जाते रहते हैं। इनके पास मोबाइल भी हैं और छोटे-छोटे ट्रांजिस्टर रेडियो भी। ये हिन्दी फिल्मों के गाने सुनते हैं और आकाशवाणी से प्रसारित समाचार भी। वैसे रेडियो लगभग सभी के घर में है। मेरे लिये यह रोमांचित करने वाला अनुभव था कि आदिवासियों में रेडियो सुनते हुए अपने काम निपटाने की आदत सा बन गई है।
अब जरा इमेजिन कीजिये कि आप आदिवासी इलाके में हैं और रेडियो गीत-संगीत के साथ दीवारों पर मीनिंगफुल पिथौरा या फिर कोई अन्य फोक पेन्टिंग बनायी जा रही है। थोड़ी ही देर में यह तैयार भी हो जाती है। उधर से गुजरने वाला हर कोई थोड़ी देर के लिये ठहरता है और कुछ न कुछ गुनता-बुनता आगे बढ़ जाता है। कौन कहता है कि इस समाज में कम्युनिकेशन के टूल्स तलाशे जाने की जरूरत है? वास्तव में हर समाज चाहे वह अगड़ा हो या पिछड़ा, अपनी बात कहने के बहाने और रास्ते तलाश ही लेता है। .. .. और हमारी रिपोर्ट की सबसे अहम पंक्ति यही है।

शुक्रवार, अगस्त 15

निशाने पर आ गया पुराना साथी रेडियो


इधर केन्द्र सरकार ने रेडियो के अच्छे दिनों को लाने की कवायद शुरू की तो उधर बॉलीवुड में भी रेडियो दिखने लगा। पिछले दिनों सरकार ने एफएम पर समाचारों के प्रसारण को हरी झंडी दी तो लगा कि अब रेडियो एक बार फिर अपने पुराने रिश्तों को जल्दी ही बहाल कर लेगा। अभी कुछ बात आगे बढ़ पाती की बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्ट कहे जाने वाले अभिनेता आमिर खान अपनी नई फिल्म के पोस्टर में बिना कपड़ों के रेडियो के सहारे अपने को अश्लील कहे जाने से बचाते हुए नजर आ गए। सरकार और बॉलीवुड के इस अंदाज ने रेडियो के प्रशंसकों में नई तरह की बहस छेड़ दी है कि आने वाले दिनों में आखिर रेडियो क्या-क्या गुल खिलाएगा।
बहरहाल मोदी सरकार ने किसी के अच्छे दिन लाए हों या नहीं, लेकिन इतना तय है कि जन माध्यमों में सर्वाधिक मजबूत रेडियो के अच्छे दिन जरूर आने वाले हैं। बहुत इंतजार के बाद अब एफ एम रेडियो पर समाचार प्रसारित करने की मांग पूरी होने जा रही है। पिछले दिनों सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में बताया कि एफएम रेडियो  के तीसरे चरण के अंतर्गत मंजूर दिशा निर्देशों के तहत निजी एफएम रेडियो पर प्रसार भारती के साथ आपसी सहमति के आधार पर ऑल इण्डिया रेडियो का समाचार फरसारित करने की मंजूरी दे दी गई है। श्री जावड़ेकर ने यह भी कहा कि एफएण रेडियो स्थानीय स्तर खेल कार्यक्रमों, यातायात और मौसम सम्बन्धित बुलेटिन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, परीक्षा व दाखिले की जानकारी, रोजगार के अवसरों की जानकारी, बिजली व जलापूर्ति तथा स्वास्थ्य सम्बन्धित जानकारियां या एलर्ट जैसी गैर समाचार सामाग्री सहजता से प्रसारित कर सकते हैं। बहरहाल सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि निजी एफएम रेडियो चैनल अपने समाचारों के लिए पीटीआई समाचार एजेंसी को भी स्रोत के रूप में अपना सकते हैं। एक महत्वपूर्ण निर्णय सरकार ने यह भी लिया है कि अब एफएम रेडियो के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 26 प्रतिशत कर दिया है। वादा तो यह भी है कि इन निर्णयों के परिणाम देखने के लिए सतत समीक्षा भी की जाती रहेगी। जाहिर है कि सरकार ने रेडियो की दुनिया को नया जीवन देने की पहल कर दी है।

यह तो तय था कि हमारे पास एक बार फिर रेडियो लौट रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच मोबाइल फोन की बढ़ती पहुंच ने एफएम रेडियो को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश के जिन बड़े शहरों में एफएम के निजी चैनलों को लोगों तक पहुंचने का मौका दिया गया, उनके अनुभव उत्साहवर्धक रहे हैं। सरकार और बाजार, दोनों एफएम की बढ़ती लोकप्रियता से उत्साह में हैं। विज्ञापन बाजार भी अपने फायदे की तलाश में लग गया है। वास्तव में रेडियो एक ऐसा माध्यम आज भी बना हुआ है जो समाचारों और मनोरंजन के लिए लोगों के करीब है। ग्रामीण भारत ही नहीं इस माध्यम की शहरी युवाओं पर भी बहुत व्यापक पकड़ है। युावओं को केन्द्र में रखकर नीतियां तय करने वाले हुक्मरान को इस माध्यम की व्यापक स्वीकृति को नकारने की हिम्मत जुटा पाना नामुमकिन है। बाजार और सत्ता, दोनों ही इसमें अपने-अपने हिस्से के मुनाफे को देख रहे हैं।
बहरहाल बाजार के मानिंद जहां अधिक से अधिक एफएम रेडियो के लाइसेंस प्राप्त करने के जुगाड़ में लग गए हैं, वहीं सरकार भी बहुत दिनों तक जनसंचार के इस सर्व-सुलभ मीडियम की अनदेखी नहीं करना चाहती। इण्डस्ट्री से जुड़े लोग कास्टिंग के इस सिस्टम के फिर से तेजी पकडऩे को लेकर उत्साह में हैं। आने वाले दिनों में अगर सबकुछ ठीक-ठाक ढंग से चलता रहा तो यह तय है कि देश के हर जिले में दो से तीन एफएम रेडियो चैनल होंगे और उनके बीच जमकर प्रतिस्पर्धा रहेगी। यह प्रतिस्पर्धा जहां अधिक से अधिक श्रोताआो को पाने की होगी, वहीं विज्ञापन बटोर लेने की भी होगी। इससे कहां इंकार किया जा सकता है कि जब पूंजी का निवेश होगा तो मुनाफे की होड़ तो मचेगी ही। यह भी तय है कि मुनाफे और पूंजी के बीच मचने वाले घमासान में कंटेंट प्रभावित होकर रहेगा।  
फिलहाल मीडिया इंडस्ट्री में रेडियो की वापसी और उसके तेजी से व्यापक हो जाने की धमक भर से एक डर सभी को सताने लगा है कि निजी एफएम रेडियो के कंटेंट पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो इसको लेकर भी टेलीविजन और सोशल मीडिया के कंटेंट को लेकर मचने वाले बवाल की तरह ही मीडिया इंडस्ट्री और सरकारी तंत्र के बीच समस्याएं खड़ी होने में देर नहीं लगेंगी।
पिछले दिनों यह बात सामने आई थी कि सरकार 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत एफएम रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली सामाग्रियों की निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है। वास्तव में सरकार ने इस योजना अवधि में देश में 800 निजी एफएम रेडियो चैनल प्रारम्भ करने का मन बनाया हुआ है, जिसकी धमक नई सरकार के आने के बाद तेजी से सुनाई देने लगी है। यह भी तय ही है कि आने वाले दिनों में ये निजी एफएम रेडियो समाचार प्रसारण का विस्तृत अधिकार पा जाएंगे। ऐसे में यह बहुत जरूरी हो जाता है कि इनसे प्रसारित होने वाले कंटेंट को किसी निगरानी तंत्र से गुजारकर ही लोगों तक पहुंचाया जाए। पिछले दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया मानिटरिंग सेंटर के एक कार्यक्रम में भारत सरकार के सूचना एंव प्रसारण सचिव ने इस बाबत जानकारी देते हुए यह चिंता जताई थी कि अभी तक रेडियो पर प्रासारित होने वाली सामाग्रियों की अर्थपूर्ण ढंग से निगरानी नहीं की जा सकी है, लेकिन इस तरह के प्रभावी तंत्र को विकसित किये जाने की जरूरत है। उस कार्यक्रम में मौजूद हर मीडिया विशेषज्ञ ने इस बात पर सहमति जताई थी।
पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया और फिर सोशल मीडिया के कंटेंट को लेकर हो चुके विवादों के मद्देनजर इस तरह की पहल बहुत जरूरी होगी। वैसे भी अभी तक जो एफएम रेडियो बाजार में हैं, उनके कंटेंट, भाषा और प्रेजेंटेशन को लेकर पहले भी प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं। दूसरी ओर मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों में से अधिकांश ने इस मीडियम को अपने सिलेबस में शामिल ही नहीं किया और अगर किया भी तो प्रायोगिक पक्ष गायब ही रहा। ऐसे में बाजार में एकाएक आने वाले एफएम रेडियो के चैनलों पर कैसे लोग और कब तक काम करेंगे, इस प्रश्न पर भी गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है।


सोमवार, जुलाई 28

कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले...


कुछ वर्षों पहले मैं एक ऐसे शहर में कार्यरत था, जिसे एक अदद विश्वविद्यालय की दरकार थी। उस शहर का हर बुद्धिजीवी गाहे-ब-गाहे अपनी बातचीत में इस कमी को ले आता और शासन-नेताओं को कोसता कि जिस शहर ने साहित्य में इतने बड़े नाम दिए, वहां एक अदद विश्वविद्यालय स्थापित कराने की कोई पहल नहीं करता। मैं अखबार में था सो मैंने इस मुद्दे को एक मुहिम की तरह लिया और लगातार इस सम्बन्ध में खबरें, लोगों के विचार, टिप्पणियां व जनप्रतिनिधियों को ललकारते बयान प्रकाशित करने शुरू कर दिये। शहर जाग गया। जगह-जगह विश्वविद्यालय की मांग को लेकर संगोष्ठियां और सेमिनार होने लगे। जुलूस निकला गया। शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भी मोर्चा सम्भाल लिया। विधायकों और सांसदोंने भी पहल शुरू कर दी। वे भी लोगों के साथ आ गए। बड़ी मशक्कत के बाद अब वहां राज्य सरकार कृषि विश्वविद्यालय को स्थापित करने जा रही है। लोग खुश हैं कि उन्हें कुछ तो मिला। लेकिन लड़ाई जारी है, जब तक की उनके सपनों का विश्वविद्यालय मिल नहीं जाता। वह शहर है आजमगढ़, जहां राहुल सांकृत्यायन, श्याम नरायण पाण्डेय, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔंध, कैफी आजमी जैसे साहित्यकार पैदा हुए या फिर उसे अपनी कर्म स्थाली बनाई। शिबली नोमानी जैसे शिक्षा प्रेमी हुए, जिन्होंने शिक्षा को आंदोलन का रूप दिया। उस शहर की एक अदद विश्वविद्यालय पाने की तड़प आज भी मेरे जेहन में रची-बसी है।
अपना शहर इलाहाबाद भी किसी से कम नहीं है। एक से बढक़र एक साहित्यकार और शिक्षाविद यहां हुए, जिनकी फेरिस्त यहां देना सूरज को रोशनी दिखाने जैसा है। भाग्यशाली है यह शहर कि यहां एक नहीं कई विश्वविद्यालय और उसके समकक्ष शैक्षिक संस्थाएं हैं। विरासत में मिले पृष्ठों को पलटें तो गौरव के कई पल हमारे शहर की साहित्यिक, सांस्कृतिक व शैक्षिक संस्थाओं से जुड़े हुए मिल जाएंगे। सच तो यह है कि किसी शहर की पहचान उसकी अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक थाती के बलबूते ही बनती है। कभी इलाहाबाद भी ऐसी ही पहचान लिए हुए पूरी दुनिया के सामने था। यहां से निकली साहित्यिक धाराएं देश की भाषायी और साहित्यिक दुनिया को दिशा देती थीं। यहां की सांस्कृतिक परम्पराएं देश ही नहीं दुनिया भर के लोगों को संगम तट पर खींच लाने में कामयाब हो जाया करती थीं। यहां का शैक्षिक परिदृश्य युवाओं के लिए आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था। इस बात से शायद ही कोई इंकार कर सके कि एक समय था कि यहां विश्वविद्यालय सरीखी शैक्षिक संस्थाओं का होना ही शहर की पहचान उसी तरह बनाता था, जैसे नालन्दा, आक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज। काश! ऐसा हमेशा ही कायम रह पाता।
बहरहाल हालात यह हैं कि हम अपने शहर की पहचान खोते जा रहे हैं। हर ओर गिरावट का माहौल है। साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं ने तो पहले ही शहरवासियों की उपेक्षा के चलते पहले ही हथियार डाल रखे हैं। कोई बड़ा साहित्यिक आंदोलन अब इलाहाबाद से उपजता ही नहीं। हर ओर एक मुंह चिढ़ाता सन्नाटा है, जिसमें शोर तो है पर वे आवाजें नहीं, जिनके पीछे चल देने का मन करे। दूसरी ओर अब वह इलाहाबाद ही नहीं रहा जो शहर की शीर्ष साहित्यिक, सांस्कृतिक व शैक्षिक संस्थाओं से रिश्ते बनाकर वर्तमान और आने वाली पीढिय़ों को कुछ देने की दरकार रख सके। सच तो यह कि इन संस्थाओं का नेतृत्व करने वाले लोग ही जनता और संस्थाओं के बीच की रिश्तेदारी का नमक बड़ी ही बेहयाई से चटकर गए और लोग मुंह बाए अपने खाते से बहुत कुछ गंवा बैठे। आज हर ओर हाहाकार है। हमारे पीछे की पीढिय़ों को अपने होने की गवाही देने के लिए जूझना पड़ रहा है। तमाशा जारी है और शहर तमाशबीन बना सब कुछ होते देख रहा है। आखिर कब तक? ....कोई तो उत्तर दे। कैफी आजमी की ये पंक्तियां दोहरा लेने का मन करता है- कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले। उस इंकलाब का, जो अभी तक बाकी है। आमीन...।

मंगलवार, जुलाई 22

मतवाला, खिचरी और महामना की ससुराल

पिछले दिनों अपनी लोक यात्रा के दौरान मैं मिर्जापुर में था। बहुत दिनों बाद मैं एक ऐसे शहर में था, जिसके पास विरासत में सहेजने को बहुत कुछ है, लेकिन वर्तमान में सिवाय जूझने के कुछ भी पास में नहीं। सच कहूं तो एक शहर के फक्कड़ पन के कई रूप हमारे सामने थे। अब देखिए न, सड़कें थीं, पर लगता रहा कि अगर ये न होतीं तो शायद अधिक बेहतर होता। किसी भी तरह से उन्हें पार करने की कोशिश काजिए, आपकी आंतें हिल जाने की गारंटी है। लोग हैं कि अपनी मस्ती में जिए जा रहे हैं। किसी को इन सड़कों से कोई शिकायत ही नहीं। फक्कड़ी का एक अंदाज सुबह-सुबह घाट किनारे भी दिखा। यहां जुटने वालों की दुनिया सबसे न्यारी लगी। लोगों का नदी और उसके तटबंधों से जुडऩे का मतवालापन देखते ही बना। नदी किनारे साढिय़ों पर बना-बसा 'लेडीज मार्केटÓ बार-बार अल्मोड़ा की मार्केट की याद दिलाता रहा। वह भी सीढिय़ों पर बना-बसा है। फर्क बस इतना है कि वहां की साढिय़ां पहाड़ के शीर्ष तक ले जाती हैं और यहां की साढिय़ां नदी के किनारे तक। मंदिरों के कपाट हमारी कलाओं की विरासत के अद्भुद नमूने दिखा रहे थे। कुछ लोग दीन-दुनिया से परे बंदरों के झुंड  को आम खिलाने में मस्त थे। यह सब हमारे सामने किसी पहले से तैयार स्क्रिप्ट की तरह था।
बहरहाल हम अपनी लोक यात्रा यानी लोक कलाओं को सहेजने की जुगत में यहां पहुंचे थे। 'कजरीÓ लोकगीत से जुडऩे, सहेजने और उसे डिजिटाइज्ड करने के दौरान मिर्जापुर की सांस्कृति व साहित्यिक विरासत से भी साक्षात्कार होता जा रहा था। मैं और मेरे सहयोगी अमित कजरी लोग गायकों की खोज में निकल पड़े। कजरी गायन की पर्याय मैना देवी के घर पर उनके  देवर हरिलाल से मुलाकात हुई तो हम इन दिनों की प्रख्यात गायिकाओं उर्मिला श्रीवास्तव और अजीता श्रीवास्तव से भी मिले। दिन भर के बाद हमारी मुलाकात प्रख्यात लेखक स्व. भवदेव पाण्डेय के पत्रकार पुत्र सलिल पाण्डेय से हुई और वे स्वेक्षा से हमारे संग हो लिए। उनका संग होना था कि हमारे सामने मिर्जापुर की विरासत के कई महत्वपूर्ण पृष्ठ अनायास ही खुल गए। हमारी इस लोक यात्रा के बीच ही 'मतवालाÓ प्रेस की पुरानी बिल्डिंग भी आ गई। हम वहां भी पहुंचे जहां निराला, उग्र और महादेव प्रसाद सेठ की बैठकें होतीं थीं और मतवाला की रूपरेखा तय होती थी। महादेव प्रसाद के प्रपौत्र ने हमें बताया कि प्रेस वाला हिस्सा उन्होंने बेच दिया है। उग्र जी जिस कमरे में रहते थे, वह कमरा अभी जस का तस है। अद्भुद अनुभूति थी उस स्थान पर पहुंच कर।
थोड़ा आगे बढऩे पर तिरमुहानी चौराहे पर हमें 'खिचरी समाचार प्रेसÓ दिखी। छोटी सी परचून की दुकान के ऊपर दीवार पर ही उभर हुए अक्षरों में लिखा हुआ  'खिचरी समाचार प्रेसÓ अपने आप में बहुत ही गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। यहीं से 1888 में महादेव प्रसाद घवन ने 'खिचरीÓ अखबार निकाला था। रोचक यह कि यह अखबार हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी, तीनों भाषाओं में होता था। आज घवन साहब की पुश्तों के पास परचून की दुकान के साथ-साथ उनकी यादें हैं, जिसे वे हमेशा सहेज लेने को आतुर रहते हैं। मेरे कहने पर उन्होंने खिचरी की कुछ प्रतियां दिखाईं और आग्रह किया कि कुछ ऐसे हो कि इन्हें लोग पढ़ें और महादेव प्रसाद घवन के योगदान को याद रखें। यूं तो मिर्जापुर की विरासत के कई पृष्ठ हमने खेंगाले, लेकिन एक और जिक्र अवश्य करूंगा। वह है महामना मदन मोहन मालवीय की ससुराल का। धुंधी का कटरा इलाके में एक छोटे से मकान के बाहर शिलापट्ट लगा हुआ है कि यह महामना की ससुराल है। पीतल के बर्तन बनाने वालों के इस इलाके में देश की शिक्षा, पत्रकारिता और राजनीति दिशा तैयार करने वाले महापुरुश की ससुराल होना वहां के लोगों को गर्व का अहसास कराता है। हमने जिससे भी उस गली का पता पूछा, उसने बहुत ही आत्मीयता के साथ उस ओर जाने का रास्ता बताया।
बहरहाल कुछ बनारस सी तासीर रखने वाले  इस शहर के लोगों  के लोग अपनी संस्कृति और सामाजिकता की बात करते हुए अपनी परेशानियां भूले रहने की कोशिश करते हैं। हां यह जरूर कहते हैं कि 'फूलन देवी से लेकर अनामिका पटेल तक जितने भी सांसद यहां से हुए किसी ने कुछ नहीं किया। हमने अब मांगना ही छोड़ दिया। अब कोई कुछ पहल करे तो अच्छा और न करे तो भी अच्छा।Ó शहर में प्रदेश के एक मंत्री के जनसम्पर्क कार्यालय का बहुत विशाल सा बोर्ड न जाने क्यों बार-बार आंखों के आगे आ जाता है, जिसमें लिखा है- अपनी परेशानियां हमें अवश्य बताएं। अब जिन्हें शहर के हालात दिखते नहीं, उन्हें बताए कौन।


सोमवार, जुलाई 7

कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो


एक बार फिर शहर में एक कहानी को लेकर बवाल मचा हुआ है। कहानी उर्दू में है सो अभी यह बवाल छन-छन कर गति पकड़ रहा है। वैसे कहानीकार ने जल्दी ही इसे किसी हिन्दी पत्रिका में छपवाने की घोषणा करके शुद्ध इलाहाबादी में यह जता दिया है कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó बताया जा रहा है कि कहानी अपने संगठनिया मित्रों के इर्द-गिर्द ही घूमती है, सो सारे किरदार बखूबी पहचान में आ जा रहे हैं। चूंकि किरदार जाने-पहचाने हैं, सो सभी उनकी करस्तानियों से भी वाकिफ हैं, लिहाजा किरदारों को अपने आस-पास के लोगों में फिट कर देने की जुगत भिड़ाने की होड़ लगी है। संगठन में उबाल है। कहानीकार है कि किसी को सेठने से इंकार करके यह दलील देने में लगा है कि चूंकि कहानी ज्वलंत मुद्दे पर है सो उसे हम अपने आस-पास ही पाएंगे। और जब कहानी आस-पास ही होगी तो किरदार भी तो हमारे बीच के ही होंगे।
बहरहाल अपने ही लोगों पर कहानी लिखकर तहलका मचाने का यह खेल नया नहीं है। पहले भी इस शहर ने कहानियों पर मचते बवाल को देखा-सुना है। कई बवाल तो राष्ट्रीय स्तर पर 'ख्यातिÓ बटोरने में भी कामयाब हुए थे। मुझे याद हैं वे दिन जब शहर में तथाकथित कहानियों के फोटोस्टेट बंटा करते थे और लोगों को जबरन पढ़वाया जाता था। इस खेल में पक्ष-विपक्ष दोनों ही शामिल रहा करते थे। साहित्यिक संगठन उस समय इसी तरह चुप थे, जिस तरह आज हैं। अंदर ही अंदर निपटने की कवायद चलती रही। पता नहीं किस तरह निपट रहे थे लोग। उन 'सत्य कथाओंÓ की व्यथा इतनी गंभीर थीं कि आज तक तथाकथित किरदारों में टीस के रूप में समायी हुई हैं। जो अब रहे नहीं उनके प्रति संवेदना अभी लोगों के दिल में है।
कभी साहित्यिक आंदोलनों के अगुआकार रहने वाले इस शहर में कहानियों और लेखों के जरिए  'कीचड़ उछालो और मस्त रहोÓ के जुमले को चरितार्थ करने के  भी प्रयास हुए हैं। एक कहानी में तो पूरा का पूरा एक साहित्यिक खेमा ही समाया हुआ था। कहते हैं कि उस कहानी को कुछ विरोधी खेमे के लोगों ने स्वयं बैठकर तैयार करवाया था। यह कहानी भी शहर भर में फोटोस्टेट कराकर बंाटी गई थी। करते भी तो क्या करते। कहानी छपी ही थी किसी गुमनाम सी पत्रिका में। कुछ और भी उदाहरण हैं ऐसी ही 'कथा करतूतोंÓ की, जिनका जिक्र करना कुछ ज्यादा ही हो जाएगा।
कहते हैं कि इतिहास अपने आपको दोहराता जरूर है। हो भी यही रहा है। शहर में एक बार फिर कहानी पर बवाल मचा है। लगातार इसे प्रचार देने की कोशिशें भी हो रही हैं। पहले इस्तीफे की राजनीति से इस मुद्दे को गरमाने का प्रयास हुआ और अब संगठनिया कार्रवाई की मांग करके इसे रोशनी में लाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। कहानीकार भी इसे हिंदी में छपवाकर तूल देने की कोशिश में हैं। इलाहाबाद एक बार फिर फार्म में है और वह भी पुराने तुर्रे के साथ कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó अब आगे-आगे देखिए होता है क्या।  

वे जो विज्ञान, कला और साहित्य की त्रिवेणी थे


उनके हिस्से में कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध हैं, जिनपर आज हम गर्व कर सकते हैं। उनकी कई साहित्यिक कृतियां हैं, जो हमारे लिए किसी धरोहर और प्रेरणा से कम नहीं हैं। उनकी कलाकृतियां, युवा कलाकारों के लिए किसी जरूरी अध्याय से कम नहीं। उनके लिखे नाटकों से आज भी रंगमंच गुलजार रहता है। सच कहा जाए तो वे विज्ञान, कला और साहित्य की त्रिवेणी थे। हां, वे अपने प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल थे।
प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल देश के जाने-माने भौतिकविद् थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विभाग में पढ़ाई, शोध और फिर अध्यापन के दौरान उन्होंने एक्स-रे, पार्टिकिल फिजिक्स, लिक्विड हीलियम और क्वांटम मिकैनिक्स जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उन्होंने शोध कार्य किया। वे विभागाध्यक्ष और विज्ञान संकाय के डीन भी रहे। भौतिकी के विभिन्न विषयों पर लिखी आपकी कई पुस्तकों के कई-कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें क्वांटम फिजिक्स और स्टेटिस्टिकल मिकेनिक्स पर लिखीं पुस्तकें महत्वपूर्ण हैं। प्रो. अग्रवाल अपने सहयोगियों और विद्यार्थियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उनकी सदाशयता व विद्वता का बखान करने वाले विद्यार्थी देश-विदेश में विभिन्न महत्वपूर्ण संस्थानों में बड़े पद पर कार्यरत मिल जाया करते हैं।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रो. अग्रवाल की रुचि शुरू से ही साहित्य सृजन और चित्रकला में भी रही। उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को कई महत्वपूर्ण कृतियों से समृद्ध किया है। इनमें छह कविता संग्रह-धूप की लकीरें, नंगे पैर, इस धरती पर, आदिहीन अनंत यात्रा, आकारहीन संसार एवं ढूंढ़ा और पाया, दो नाटक संग्रह-तीन अपाहिज एवं खोए हुए आदमी की खोज तथा लोटन नाटक, तीन निबंध संग्रह-आधुनिकता के पहलू, सृजन के परिवेश एवं कविता, नाटक तथा अन्य कलाएं और एक उपन्यास-बीती आप बीता आप शामिल हैं। ग्यारह बार उनकी चित्रकला की कृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। यह प्रदर्शनी इलाहाबाद, लखनऊ और दिल्ली में ही नहीं, बल्कि न्यूयार्क में भी आयोजित हुई। उनकी इस सृजन यात्रा के विभिन्न आयामों पर शोध कार्य भी हुए हैं और हो रहे हैं।
इसी आठ जुलाई को प्रो. बिपिन कुमार अग्रवाल की पचीसवीं पुण्यतिथि है। हम उन्हें स्मरण करते हुए सृजन परिवेश का ताना-बाना बुनने वालों की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस संदर्भ में देश में हिन्दी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुटी प्रमुख संस्था विज्ञान परिषद ने एक पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसका विमोचन आठ जुलाई को ही होना है। इस पुस्तक का सम्पादन प्रो. शिव गोपाल मिश्र व डा. बबिता अग्रवाल ने किया है। अपने महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘विज्ञान पत्रिका’ का शताब्दी वर्ष मना रही विज्ञान परिषद की यह पहल स्वगात योग्य तो है ही, यह हमें अपने समय में कुछ नया करने और अपनी विरासत से जुडऩे का अवसर भी देती है।