रविवार, मई 22

बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरण



निदेशक, समाज सेवा सदन, इलाहाबाद/hindi.indiawaterportal.org/node/53282

सोमवार, फ़रवरी 22

समानांतर आवाजें भी महत्वपूर्ण होती हैं

कुछ लोग नारे लगा रहे थे। उनके नारों के प्रत्यत्तर में कुछ दूसरे लोग नारे लगाने लगे। दोनों को एक-दूसरे के नारे पसंद नहीं आ रहे थे। एकाएक दोनों के नारे आपस में टकराने लगे। फिर लोग आपसे में टकराने लगे। फिर दोनों तरफ से पहले पत्थर, फिर गोली और फिर बम चलने लगे। अफरा-तफरी मच गयी। लोग भगा दिए गए। नारे, जो जरूरी थे, गायब हो गए। फिर खो से गए। भिंची हुई मुट्ठियां खुल गईं। और, सब कुछ बदल देने वाले नारे किताबों में भी नहीं मिलते अब। सच ही है कि समानांतर आवाजों का समय अपनी बनावट से पहले ही खत्म हो जाया करता है। काश हर समय और हर समाज में यह समझा जा सकता कि समानांतर आवाजें जरूरी होती हैं। और, वहां तो और भी जहां जनतंत्र सांस लेने में गर्व महसूस करता हो।
गुटों में बंटे हमने समानांतर आवाजों की जगह बनाने में हमेशा से कोताही की है। हमने हमेशा से उन्हीं आवाजों को सुनना चाहा है जो हमें बेहतर लगती हैं। समय कोई भी रहा हो, सत्ता कोई भी रही हो, साहित्य और संस्कृति के पैरोकार कोई भी रहे हों, समाज चलाने वाले लोगों की मंशा और मकसद कुछ भी रही हो, सबने अपने-अपने लिहाज से समानांतर आवाजों को दबाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। हमें जो अपने पक्ष में लगी, उसी आवाज को हमने जरूरी माना और बाकी सबको बेमानी कहकर खारिज करने में तनिक भी देर नहीं लगाई। नतीजा हमारे सामने है। हम ऐसे समय में आन खड़े हैं, जहां कोई किसी को शिद्दत के साथ सुनना ही नहीं चाहता।
वास्तव में हमारे समाज की बनावट में समानांतर आवाजों का बहुत बड़ा यागदान रहा है। समाज बना और लगातार संवरा तो इन्हीं समानांतर गूंजती आवाजों के भरोसे। हमने सांस्कृतिक विविधता का ताना-बाना भी इन्हीं समानांतर आवाजों को आधार बनाकर तैयार किया। हमारी एकेडेमिक सोच और समझ का दायरा इन्हीं समानांतर आवाजों ने तय किया। हम शिक्षा के आलयों में इन्हीं आवाजों के बलबूते बने रह पाए और आगे बढ़ते रहे। लेकिन जब से हमने इन आवाजों का साथ निभाना छोड़ा है, तमाम जरूरी चाजें हमारा साथ छोडऩे लगी हैं। हम भीड़ में भी अकेले रह से गए हैं। जाहिर है कि अकेले होते जाते इस समय में अब लोगों का एक-दूसरे का साथ निभाना मुश्किल होता जा रहा है और यही वजह है कि समाज में बिखराव सा दिखने लगा है।
हां, समानांतर आवाजों के मायने भी बदल चुके हैं। विरोध के लिए विरोध करना परम्परा और संस्कृति का रूप लेने लगा है। विरोध का तर्क से रिश्ता खत्म सा है। अब केवल सामने वाले को नीचा दिखाने या फिर उसे और उसकी सोच को खारिज करने के लिए आवाजें की जा रही है। यह जानते-बूझते हुए कि ऐसी आवाजें समानांतर आवाजों का श्रेणी में नहीं आती, उन्हें समानांतर कहकर बुलंद किया जा रहा है। और अगर ऐसी तमाम आवाजें अपने मायने खो दे रही हैं तो फिर उस पर बहस कैसी? जरूरत है कि समानांतर आवाजों के मायने और समाज में उनकी जरूरत को समझा जाये और अपने समय में मौजूद तमाम पीढिय़ों को समझाया भी जाये।

 

सोमवार, जनवरी 11

इलाहाबाद जिन्हें कभी भुला नहीं पाएगा


पंजाबियत उन पर फबती थी। मुम्बईया स्टाइल में वे कभी-कभी दिख जाया करते थे। दिल्ली उन्हें कामकाजी शहर लगता था। लेकिन, जिस शहर को वे अपनी रगों में महसूस किया करते थे, वह इलाहाबाद ही था। ठेठ इलाहाबादी। यानी पुराने शहर के रंग में रंगी-तपी तबीयत की शख्सियत। रानी मंडी में रहते हुए उन्होंने जो रिश्ते कमाए थे, उनकी दमक आज भी है। जिस गली में वे रहते थे और उनका प्रेस था, वहां उनके निधन की खबर पर उन्हें याद करते लोगों से मिल कर देखिए, पता लग जाएगा कि आखिर वे इलाहाबाद को अपने पसंदीदा शहरों में सबसे ऊपर क्यों रखा करते थे।
हालैण्ड हाल छात्रावास में उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों के पास इतना कुछ था कि यह तय करने में किसी को देर न लगे आखिर वह था इन्हीं में से कोई एक या फिर सब में वह। साठोत्तरी पीढ़ी के कहानीकारों में प्रसिद्ध चार यारों की चौकड़ी में से एक कथाकार दूधनाथ सिंह जब अपने दोस्त को याद करने खड़े हुए तो दोस्त की वे चुहलबाजियां याद आईं जो उसकी जिंदादिली का सुबूत थीं। वे याद करते गए और दोस्ती के कई दृश्य सबके सामने उभरते रहे। कई ने तो इस यादगार वक्तव्य को रिकार्ड किया तो कई इसे अपलक सुनते रहे। जो कोई भी उन पर बोलने खड़ा हुआ उसे उनके सानिध्य में बिताए आत्मीय क्षण ही याद आते रहे।
मुम्बई से फिल्म लेखक आनंद कक्कड़ कह रहे थे कि दिल्ली में रहते हुए भी वे इलाहाबाद को नहीं बिसराते थे। इलाहाबादी लेखकों, भले ही वह इलाहाबाद छोडक़र कहीं और रह रहे हों, की रचनाएं सामने आते ही नरम पड़ जाते थे और उसे एक सर्रे में पूरा पढ़ जाते थे। रचना अगर छापने के लिए भेजते तो उसे तत्काल फोन पर बात कर बता देते। पता चला कि वे जब गंगाराम हस्पताल में जीवन और मृत्य से संघर्ष कर रहे थे, तब उनके पीछ के पीढ़ी के तमाम रचनाकार वहां पहुंच गए थे। कोई रो रहा था तो कोई उनके स्वास्थ्य के संदर्भ में डाक्चरों से राय-मश्विरा कर रहा था। ये वही थे, जिन्हें उन्होंने न केवल बनाया, बल्कि लगातार मांजने और पहले से अधिक बेहत बनाने में लगे रहे।
फोन पर कवि यश मालवीय से बात हुई तो खूब रोए हम दोनों। कितनी बार हम निराश हुए, और हर बार किसी ने कंधे पर हाथ रखकर कहा- आगे बढ़ो। रुको मत। बस हम उठ खड़े होते रहे। उनकी यही आदत सबको उनसे जोड़ती रही। परेशानियों में भी हंसने का बहाना खोज लिया करते थे। बहुत देर तक गंभीर होकर वे बैठ ही नहीं सकते। उनके वक्तव्यों में जरूर ऐसा कुछ न कुछ हुआ करता था जो रोचक और रोमांच भर देने वाला होता था। बीमारी को सेलिब्रेट करने का फण्डा मैंने उन्हीं से सीखा। वे हर दर्द की ब्राण्डिंग कुछ इस तरह करते कि सामने वाले को अहसास हो जाता कि वे खुद को राहत देने की कोशिश कर रहे हैं।  लेकिन, थोड़ी ही देर में सामने वाला जीवन जीने की इस कला का कायल हो जाता और भूल जाता कि वह किसी बीमार का हाल-चाल लेने आया था।
ऐसे ही अनगिनत क्षण और बातें हैं, जो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अभी-अभी जो हम सब के बीच से चला गया है, वह दरअसल अपने शब्दों और बीते पलों की स्मृतियों में हमेशा मौजूद रहेगा। . ..इलाहाबाद शायद ही कभी उन्हें भुला पाएगा। विनम्र श्रद्धांजलि...कथाकार, उपन्यासकार, सम्पादक, दोस्तों के दोस्त ौर इन सबसे बढक़र एक लाजवाब इंसान... रवीन्द्र कालिया।


तो क्या खंडहर ...
तो क्या इलाहाबाद का साहित्यिक ताना-बाना खंडहर में बदलता जा रहा है? उत्तर आपके पास कुछ भी हो, लेकिन कथाकार दूधनाथ सिंह अपने दोस्त कालिया को याद करते हुए इस बात को इशारों ही इशारों में कहकर चिंता तो जता ही गए। यह सही है कि इलाहाबाद उन बड़े रचनाकारों से खाली होता जा रहा है, जिन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब और अपने से पीछे की पीढ़ी को तैयार करते रहने की रवायत को बखूबी निभाया। वैसे इसी तरह की बात उर्दू के आलोचक अली अहमद फातमी ने भी की। यह सही भी है और पीछे-पीछ चलकर आगे बढ़ रही पीढिय़ों के लिए चुनौती भी। हां, अच्छा लगा कि कवि संतोष चतुर्वेदी ने यह आश्वासन देने में देर नहीं की कि हम बुजुर्गों से मिली रवायत को निभाते रहेंगे।



और अब इस बार की कविता
इस बार प्रस्तुत है कवि अशोक बाजपेयी की ये पंक्तियां
हम चुप हैैं:
हमारे शब्दों का सम्बन्ध टूट गया है।
हम दूर जाते आदमी को
उसके थैले में ठुंसे दुख को,
उसके माथे की शिकनों को
महसूस नहीं कर पाते।
हम मुहल्ले में हो रहे शोर को,
मारो-काटो-पीटो की चीखों को,
औरतों-बच्चों के रोने को
ठीक से सुन नहीं पाते।
हम चुप हैं,
हमारे शब्दों ने हमें छोड़ दिया है।
सी. धनंजय




रविवार, जनवरी 10

प्रयोगधर्मी सम्पादक थे रवीन्द्र कालिया


‘हम सब रवि को यूं ही जाने नहीं देंगे। भरोसा रखो वे वापस लौटेंगे।’ तीन दिनों पहले ममता जी ने जब ये कहा था तो अनायास ही लगने लगा था कि शायद कुछ आश्चर्यजनक घटे और कालिया जी एक बार फिर हम सब के बीच हों। पर नहीं, ऐसा नहीं हो सका। हम सब के बीच से एक ऐसा व्यक्तित्व विदा ले गया है, जिसने रचनाकारों और पत्रकारों की कई-कई पीढिय़ों को बनाने और मांजने-संवारने का काम  किया। जालंधरी मस्ती, बम्बईया अंदाज और इलाहाबादी ठसक लिए हुए कालिया जी साथ हों तो जीने के मायने कुछ अलग ही हो जाया करते थे। वे सिखाते, हंसाते और फिर बेहतर करने का उत्साह बड़ी ही सहजता से दे देते।
मुझे उनके साथ तब के चर्चित साप्ताहिक गंगा-जमुना में सीखने और कुछ बेहतर कर गुजरने का मौका मिला। वे शीर्षकों को लगाते समय और खबरों को जीवंतता देते समय बड़ी ही सतर्कता बरतते और साहितियक चुहल से उनमें रोमांच और रोचकता भर देते। कई बार तो गंगा जमुना में छपने वाले आलेख या खबर अपने शीर्षकों से ही चर्चा में आ जाते थे। मैंने उनसा प्रयोगधर्मी सम्पादक नहीं देखा। उन्होंने देश की वागर्थ और नया ज्ञानोदय पत्रिका का सम्पादन करते हुए साहित्यिक पत्रकारिता को एक नए ढंग के तेवर से लैस कर दिया। ज्ञानोदय में तो उन्होंने लेखकों का परिचय देने में जो प्रयोग किया वह अद्भुद था। वे किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाते थे और फिर वे उसपर अडिग रहते थे। हम लोगों के साथ किसी विषय पर चर्चा होती तो हमेशा अभिभावक की मुद्रा में आ जाते और पहले सबको सुन लेते तब अपनी बात रखते।
मुझे याद है, जब इलाहाबाद की रानी मंडी में स्थित अपने निवास को वे छोड़ रहे थे और किताबों को ढेर अलमारियों से बाहर आया हुआ था। उनकी इलाहाबाद प्रेस में छपी कई किताबें भी उस ढेर में थीं। रचनाओं की इतनी अकूत सम्पदा मेरे सामने थी। मैं उस बड़ी ही कातर दृष्टि से निहार रहा था। वे तपाक से बोले- कुछ किताबें लेनी हो तो उठा सकते हो। बस फिर क्या था मैंने तड़ातड़ कई किताबें छांट लीं। उन्होंने उन किताबों को देखा और कहा कि-  तुम पास हो गए। अगर फेल हुए होते तो मैं किताबें वापस धरवा लेता। मैंने पूछा कि पास होने से आपका क्या मतलब है? तो वे बड़ी ही सहजता से बोले- किताबों का चयन। नई पीढ़ी में पढऩे-लिखने की आदत पड़े, इसे लेकर वे हमेशा कुछ न कुछ सुझाते रहते थे। मैंने उन्हें जब भी विश्वविद्यालय में अपने विभाग सेन्टर ऑफ मीडिया स्टडीज में बुलाया वे समय निकालकर दिल्ली से आए और कुछ नया बता कर-सिखाकर गए।
मुझे व्यंग्य लिखने की आदत उन्हीं ने डलवाई। गंगा जमुना में ‘बैठे ठाले’ कॉलम में मेरे लिखे व्यंग्य छपा करते थे। पिछले वर्ष जब उनका संग्रह आया तो वे दिल्ली से इलाहाबाद उसका विमोचन करने आए। यह मरे लएि बड़ी बात था, लेकिन उन्होंने कहा कि तुम मेरे दोस्त हो और दोस्त की बात भला कोई टाल सकता है। मैं उनसे उम्र में बहुत छोटा था, लेकिन वे हमेशा अपने छोटों के बीच उन सा ही हो जाया करते थे। यही वजह थी कि युवाओं की फौज को वे संवारने का काम बड़ी ही सहजता से कर सके। वे कई पीढिय़ों तक भुलाए नहीं जा सकेंगे। उनके शब्द हमेशा साथ निभाते रहें।

रविवार, दिसंबर 6

फेसबुकिया साहित्यिक क्रान्ति की कोशिश

सोशल मीडिया के धुरंधर मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी, अन्ना और अरविन्द केजरीवाल इतनी प्रसिद्धि न पाए होते अगर फेसबुक न होता। इन सब को बनाने में सोशल मीडिया का अद्भुद योगदान है। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना के आंदोलन में सोशल मीडिया की भूमिका से रू-ब-रू होने के बाद से ही लोगों को यह आभास हो गया था कि विकल्प के रूप में हाथ लगा यह मीडिया टूल बड़े काम का है। कई लोगों ने इसे इस्तेमाल करके बुलंदी पर पहुंचने का ख्वाब भी पाला और लगे रहे, लेकिन बाजी मारी पहले नरेन्द्र मोदी ने और फिर अरविन्द केजरीवाल ने। हाल में हम कह सकते हैं कि इसी तरह की बाजी नितीश कुमार के हाथ भी लग गई। लोगों तक पहुंचने का इससे बेहतर रास्ता अब और कोई नजर ही नहीं आता है, ऐसा कहने वालों की जमात धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है। यही वजह है कि राजनीति के पाले में धूम मचाने के बाद अब यह करामाती मीडिया साहित्यिकों को लुभा रहा है। आने वाले दिनों में कोई बड़ी साहित्यिक क्रांति अगर सोशल मीडिया के रास्त हम-आप तक पहुंचे तो कोई आश्चर्य मत कीजिएगा। 
इधर कई वर्षों से कई साहित्यकार और साहित्य सुधी फेसबुक पर सक्रिय हैं। कई ने बकायदा अपने पेज बना रखें हैं। कई का तो नियमित का शगल है कि वे कुछ न कुछ फेसबुक पर लिखते रहते हैं। अरे जब अपनी बातों को बेधडक़ चस्पा करने के लिए दनिया भर में दिखने और पढ़ी जा सकने वाली बड़ी दीवाल मिली हो तो किसका मन नहीं करेगा कि वह उस पर अपना नाम और अपनी रचना चस्पा कर ही दे। होड़ मची हुई है कि कौन क्या नया लिख दे। कोई कविताएं लिख रहा है तो कई शायरी के पृष्ठ दर पृष्ठ तैयार करे दे रहा है। किसी ने फेसबुक को अपनी लघु कथाओं को लोगों तक पहुंचाने का रास्ता बना लिया है तो कोई तमाम मुद्दों पर विचारों का जखीरा प्रस्तुत कर देने में जुटा हुआ है। यह अनायास नहीं है कि फेसबुक पर लिखे जा रहे साहित्य पर देश के बड़े प्रकाशकों की निगाह पड़ चुकी है और वे इन्हें प्रकाशित करने की पहल कर रहे हैं। हाल ही में रवीश कुमार के फेसबुक पर लिखी गईं लघु प्रेम कथाओं यानी लप्रेक को देश के एक बड़े प्रकाशक ने किताब रूप में प्रकाशित करके यह तो तय ही कर दिया कि सोशल मीडिया को नजरअंदाज कर देना समय की बड़ी भूल होगी। यहां मैं यह साफ कर दूं कि फेसबुकिया साहित्य में से अधिकांश बकवास और कूड़ा भी है। उसे इतर रखकर ही बात कर रहा हूं और ऐसा किया ही जाना चाहिए, यह मेरा मानना है।
बहरहाल मुद्दा यह है कि इन दिनों फेसबुकिया साहित्यिक क्रांति लाने की कोशिश हो रही है। वैसे तो छोटी-मोटी क्रांति लाने की कोशिश तो रुक-रुककर होती ही रहती है, लेकिन हाल के दिनों में कई साहित्यिकों ने संगठित रूप में यह प्रयास शुरू कर दिया है और एक बड़ी क्रांति करने की कवायद में जुटे नजर आ रहे हैं। वैसे आइडिया बुरा नहीं है, लेकिन इसके खतरे भी हैं और उनसे सावधान रहने और फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने की जरूरत है। विचारों में अतिरंजता साहित्य और नए जमाने के पढ़ाकुओं को साहित्य से दूर भी कर सकती है। हम चीजों को थोपने की बजाय सहभागी संचार के माध्यम से आगे बढ़ाएंगे तो सफलता हाथ लगने में कसर नहीं रहेगी। लेकिन दुखद यही है कि अभी तक की कोशिश में अतिरंजता और कट्टरख्याली अधिक है। साहित्य के जितने भी वाद और युग रहे हैं, उनमें शामिल रचनाकारों ने सहजता व समरसता के साथ दूसरे के विचारों को स्पेस देने की रवायत को नहीं छोड़ा। यही वजह रही कि वे अपने साहित्यिक आंदोलन में अधिक से अधिक लोगों को जोड़ पाने में सफल रहे। इसी बात को ध्यान में रखकर आगे बढऩे की कोशिश होनी चाहिए। बाकी सब.....।  
 

सोमवार, अक्टूबर 19

ओह, हम उतने वफादार क्यों नहीं निकले

इस बात से हम कतई इंकार नहीं कर सकते कि हम अपने समाज और संस्कृति के प्रति उतने वफादार नहीं निकले, जितने कि हमारे पुरखे थे। टेक्नोलाजी के बल पर इतराने वाली मीडिया की चकाचौंध में हम यह समझ ही नहीं सके कि हमारी संस्कृति और सामाजिकता को धता बताया जा रहा है। हमारे संस्कारों को हमारे ही घर में हाशिये पर ढकेला जाता रहा और हम चुपचाप पड़े रह गये। किसी ने टोकने की कोशिश भी की तो हमने समय की मांग कहकर उसे टाल दिया। बंटाधार तो यह हुआ कि हमारा ध्यान समाज के उस तबके की ओर गया ही नहीं, जो इन परिवर्तनों को ही सच मान रहा था। यह इस लिए भी कि उसके सामने हमारे समाज और संस्कृति का सच था ही नहीं। और ये थे हमारे घर-परिवार-समाज के बच्चे। वास्तव में हमारे बच्चे उतने बच्चे नहीं रहे कि हम उनमें अपने बचपन की झलक भी पा सकें। इनकी उम्र अपनी असल उम्र से भी कहीं अधिक लगती है। इनकी तरह की मेच्योर बातें और हाव-भाव हमारे पास कभी नहीं रहे।
कभी-कभी लगता है कि ये बच्चे हमसे भी कई वर्ष अधिक बड़े हो गये हैं। कई-कई मायनों में हम इनके आगे बौने नजर आते हैं। ये बात करते हैं तो इनकी आंखों की चमक देखने लायक होती है। बातों और आंखों की चमक एक नये समय के नये विचारों के साम्राज्य के फैलने पसरने के संकेत देते हैं। बड़ी बात यह कि कभी-कभी इनकी आंखों में सपने नहीं बल्कि महत्वकांक्षायें नजर आती हैं। अपनी महत्वकांक्षाओं को साकार करने के तमाम वैध-अवैध गुर इन्हें मालूम हैं। खतरनाक तो यह कि इन्हें अपने परवरिशकर्ताओं की सलाह की कोई जरूरत नहीं है। बेवजह लगने वाली सलाहों को ये बड़ी ही बेरहमी से खारिज कर देते हैं, बिना इसकी परवाह किये कि पुश्त दर पुश्त चलती आ रही इन्हीं सलाहों को मान कर इनके परवरिशकर्ता अपनी जिन्दगी में सफलतायें अर्जित करते आये हैं।
फिलहाल अपने समय की भयावह होती जा रही फैंटेसी में किसी अदृश्य दैत्य की उंगली पकडक़र आगे बढ़ते हमारे समय के बच्चे अब हमारे लिए ही चुनौती बनते जा रहे हैं। चुनौती भी ऐसी कि हम सामना करने से या तो कतराएं या फिर जूझते हुए हारने के लिए तैयार रहें, क्योंकि टेक्नोलॉजी ने हमें यानी हमारी और हमसे पहले की पीढिय़ों को आउटडेटेड घोषित कर दिया है। अगर जीतना है तो हमें भी इन पीढिय़ों के संग-संग कदमताल करके आगे बढऩा होगा। नए जमाने की नई धुन के साथ थिरक नहीं सकते तो क्या हुआ हम झूम तो सकते ही हैं। और इससे बड़ा सच क्या हो सकता है कि यही तो बचा है हमारे हिस्से की लड़ाई में। सच तो यह कि जो कुछ हमारे सामने है, इसके लिए हम सब जिम्मेदार लोग खुद जिम्मेदार हैं। इसलिए चूं-चपड़ करने से बेहतर है कि नई पीढ़ी के संग हो लिया जाए और उनके संग-संग चलते हुए जो कुछ बेहतर किया जा सकता है, उसे बेहतर करना जारी रखा जाए। अबकी चूके तो यह तय है कि ‘ढंूढ़ते रह जाओगे’ की उक्ति हमारे साहित्य और संस्कृति पर फिट बैठेगी।

देर आए तो सही पर क्या दुरुस्त भी आए?

बरसों से साहित्यकारों की चुप्पी देख कर कोफ्त हुआ करती थी। बड़े-बड़े मुद्दे आए और निकल गए, लेकिन साहित्य बिरादरी चूं तक करने से बची रही। इक्का-दुक्का विरोध हुआ और इतिश्री मान लिया जाता रहा। मुझे याद है, जब चौरासी के दंगों में पूरे के पूरे सिक्ख खनादान ही मार दिए गए थे या फिर जला दिए गए थे, तब देश में कहीं भी इस तरह का विरोध नहीं दिखा था। न सम्प्रदायवादियों का और न ही सेक्युलरवादियों का। कितने घरों में भय का माहौल वर्षों तक बना रहा। कई-कई खानदान अपने जम-जमाए ठीहे से पलायन कर गए। अकेले इलाहाबाद से ही कितने परिवार पंजाब चले गए। लगता था कि इनकी आवाज उठाने वाला कोई है ही नहीं। आज जो लोग जागे हैं, उनमें से कई तब भी थे और आज से कहीं अधिक जवान और ऊर्जावान थे तब वे। फिलहाल जब जागो तभी सवेरा। लेकिन, ये जिन्हें बहुत पहले ही जाग जाना चाहिए था, वे अब जाग रहे हैं तो सवाल उठने लाजमी हैं। लोगों को इनके जागने में राजनीति दिख रही है तो गलत नहीं है।
वास्तव में सत्ता और साहित्य का हमेशा से छत्तीस आंकड़ा रहा है। साहित्य की प्रवृत्ति ही रही है कि वह व्यवस्था का विरोध करे और उसे जनता के हित में करने की पुरजोर कोशिश करे। सत्ता हमेशा जनता के पक्ष में होने और दिखने की पूरी कोशिश करती है, लेकिन सच्चाई में वह हो नहीं पाती। चाहे वह कोई भी राजनीतिक दल हो वह चाह कर भी सभी को खुश नहीं कर सकता। भारतीय राजनीति में यह संभव ही नहीं है। जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे मुद्दे हमेशा से आड़े आते रहे हैं। शोषण और पोषण के बीच की खाई को पाटने के लिए जनता ही इस्तेमाल में लाई जाती है। साहित्य इसी के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहता है। इतिहास पलटकर देख लीजिए जनता के बीच वही साहित्य लोकप्रिय हुआ है, जिसने सत्ता के खिलाफ खड़े होकर जनता की आवाज बुलंद की हो। अब ऐसे में जनता अपनी जीवन यात्रा के हर मोड़ पर यह आशा लगाती ही है कि उसकी आवाज बुलंद करने का बीड़ा उसके अपने समय का साहित्य उठाए। अफसोस यह कि अपने देश में अस्सी के बाद से ऐसा होता दिखा ही नहीं।
इमरजेंसी के बाद थके-हारे साहित्यकारों ने जनता शासन और फिर कुछ सुधरे से दिखे कांग्रेस शासन के बाद यह मान लिया कि उनके अपने समय की लड़ाई खत्म हो गई और वे चुपचाप पड़े रहने में भलाई समझ बैठे। मुझे ऐसा कोई बड़ा आंदोलन याद नहीं आता, जो पिछली सदी में सन अस्सी के बाद से अब तक के समय में साहित्यकारों द्वारा चलाया गया हो। सब एक दूसरे की पीठ थपथपाने या फिर खुद ही खुद की पीठ थपथपाने में मस्त रहे। ‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह के दे’ कहावत को चरितार्थ करते हुए पुरस्कार बांटे जाते रहे। संस्थाओं पर कब्जेदारी को लेकर जोड़-तोड़ की जाती रही। प्रकाशकों के साथ मिलकर सरकारी खरीद का लाभ साझा किया जाता रहा और रोना रोया जाता रहा कि पाठक कम हो रहे हैं। जनता कभी मंदिर-मस्जिद तो कभी मण्डल के नाम पर छली जाती रही और सब के सब चुप मार कर अपनी-अपनी सेंध में दुबककर बैठे रहे।  वादों और प्रतिवादों में बंटकर खुद की बात खुद की बनाई मंडली से की जाती रही और उन बातों को अनसुना किया जाता रहा जो इनके खेमे की नहीं थी। जनता ने साहित्य की ओर देखना ही बंद कर दिया तो नए समय और टेक्नोलॉजी को कोसना शुरू कर दिया गया। कह दिया गया कि जनता होड़ और हड़बड़ी में है। मीडिया को भी कोसा गया कि उसने जनता को साहित्य से दूर कर दिया। 
खैर बड़े दिन बाद सब जगे हैं। पुरस्कार वापस हो रहे हैं। ‘पुरस्कार वापसी’ को लेकर उसी तरह चर्चा हो रही है, जैसे कुछ दिनों पहले तक ‘घर वापसी’ और ‘काला धन वापसी’ पर चर्चाएं हो रही थीं। आरोप-प्रत्यारोप के बीच कई बड़े साहित्यकारों ने ‘पुरस्कार वापसी’ को उचित ठहराने में गुरेज किया है। चाहे प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह हों या फिर लेखक महीप सिंह। लेखिका मृदुला गर्ग हों या फिर गिरिराज किशोर, गोपालदास नीरज सरीखे बड़े रचनाकार। हम सुनें तो सही कि ये क्या कह रहे हैं। कहीं ये सही तो नहीं कह रहे। हम बहुत दिन बाद जगे हैं, तो सोचे-समझें। ऐसा न हो कि हम अपनी उसी शाख को काट डालें, जिस पर हम बैठे हैं।