सोमवार, जुलाई 7

कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो


एक बार फिर शहर में एक कहानी को लेकर बवाल मचा हुआ है। कहानी उर्दू में है सो अभी यह बवाल छन-छन कर गति पकड़ रहा है। वैसे कहानीकार ने जल्दी ही इसे किसी हिन्दी पत्रिका में छपवाने की घोषणा करके शुद्ध इलाहाबादी में यह जता दिया है कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó बताया जा रहा है कि कहानी अपने संगठनिया मित्रों के इर्द-गिर्द ही घूमती है, सो सारे किरदार बखूबी पहचान में आ जा रहे हैं। चूंकि किरदार जाने-पहचाने हैं, सो सभी उनकी करस्तानियों से भी वाकिफ हैं, लिहाजा किरदारों को अपने आस-पास के लोगों में फिट कर देने की जुगत भिड़ाने की होड़ लगी है। संगठन में उबाल है। कहानीकार है कि किसी को सेठने से इंकार करके यह दलील देने में लगा है कि चूंकि कहानी ज्वलंत मुद्दे पर है सो उसे हम अपने आस-पास ही पाएंगे। और जब कहानी आस-पास ही होगी तो किरदार भी तो हमारे बीच के ही होंगे।
बहरहाल अपने ही लोगों पर कहानी लिखकर तहलका मचाने का यह खेल नया नहीं है। पहले भी इस शहर ने कहानियों पर मचते बवाल को देखा-सुना है। कई बवाल तो राष्ट्रीय स्तर पर 'ख्यातिÓ बटोरने में भी कामयाब हुए थे। मुझे याद हैं वे दिन जब शहर में तथाकथित कहानियों के फोटोस्टेट बंटा करते थे और लोगों को जबरन पढ़वाया जाता था। इस खेल में पक्ष-विपक्ष दोनों ही शामिल रहा करते थे। साहित्यिक संगठन उस समय इसी तरह चुप थे, जिस तरह आज हैं। अंदर ही अंदर निपटने की कवायद चलती रही। पता नहीं किस तरह निपट रहे थे लोग। उन 'सत्य कथाओंÓ की व्यथा इतनी गंभीर थीं कि आज तक तथाकथित किरदारों में टीस के रूप में समायी हुई हैं। जो अब रहे नहीं उनके प्रति संवेदना अभी लोगों के दिल में है।
कभी साहित्यिक आंदोलनों के अगुआकार रहने वाले इस शहर में कहानियों और लेखों के जरिए  'कीचड़ उछालो और मस्त रहोÓ के जुमले को चरितार्थ करने के  भी प्रयास हुए हैं। एक कहानी में तो पूरा का पूरा एक साहित्यिक खेमा ही समाया हुआ था। कहते हैं कि उस कहानी को कुछ विरोधी खेमे के लोगों ने स्वयं बैठकर तैयार करवाया था। यह कहानी भी शहर भर में फोटोस्टेट कराकर बंाटी गई थी। करते भी तो क्या करते। कहानी छपी ही थी किसी गुमनाम सी पत्रिका में। कुछ और भी उदाहरण हैं ऐसी ही 'कथा करतूतोंÓ की, जिनका जिक्र करना कुछ ज्यादा ही हो जाएगा।
कहते हैं कि इतिहास अपने आपको दोहराता जरूर है। हो भी यही रहा है। शहर में एक बार फिर कहानी पर बवाल मचा है। लगातार इसे प्रचार देने की कोशिशें भी हो रही हैं। पहले इस्तीफे की राजनीति से इस मुद्दे को गरमाने का प्रयास हुआ और अब संगठनिया कार्रवाई की मांग करके इसे रोशनी में लाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। कहानीकार भी इसे हिंदी में छपवाकर तूल देने की कोशिश में हैं। इलाहाबाद एक बार फिर फार्म में है और वह भी पुराने तुर्रे के साथ कि 'कहानी कहना रहा, कह दिया, का कर लेबो।Ó अब आगे-आगे देखिए होता है क्या।